सिंदी बैठक: ऐतिहासिक पड़ाव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ    30-Sep-2026
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फरवरी 1939 के तीसरे सप्ताह में वर्धा जिले के सिंदी में संघ के शीर्ष नेतृत्व की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। डॉ. हेडगेवार के जीवनकाल में यह उनकी अंतिम बड़ी बैठक थी। स्वतंत्रता की आहट महसूस की जा रही थी और द्वितीय विश्व युद्ध जैसे अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों ने इस आशा को और प्रबल कर दिया था। उस समय भारत पर शासन कर रहा इंग्लैंड शत्रुतापूर्ण परिस्थितियों से जूझ रहा था और वैश्विक घटनाओं पर अपनी पकड़ खोता जा रहा था। इंग्लैंड की यह बिगड़ती स्थिति साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के अंत के संकेत के रूप में देखी जा रही थी।
 
डॉ. हेडगेवार भी संभवतः उसी दिशा में सोच रहे थे, किंतु वे वास्तविकताओं से भली-भांति परिचित थे। उन्हें संदेह था कि क्या देश अनुकूल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाने की स्थिति में है? उस समय संघ की पहुँच केवल मध्य प्रांत, बरार और पंजाब जैसे कुछ क्षेत्रों तक सीमित थी। देश के अन्य हिस्सों में इसका विस्तार होना शेष था। यद्यपि संघ कुछ नए क्षेत्रों में प्रवेश करने में सफल हुआ था, फिर भी भरत का विशाल भूभाग इसके कार्य से अछूता था। इस तथ्य से भली-भांति अवगत रहते हुए डॉ. हेडगेवार ने सिंदी में एक बैठक बुलाने का निर्णय लिया। वह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि विगत कुछ महीनों से उनकी तबीयत निरंतर खराब थी और सम्भवतः वे दीर्घकालिक व्यवस्थाओं को सुनिश्चित करना चाहते थे।
 
यह महत्वपूर्ण बैठक बाबनराव पंडित के बंगले में आयोजित हुई थी। इसमें श्री गुरुजी, अप्पाजी जोशी, बालासाहेब देवरस, तात्या तेलंग, विट्ठलराव पतकी, बाबाजी सलोडकर, नानासाहेब टालाटुले और कृष्णराव मोहरिर जैसे संघ के कई प्रमुख कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। संगठन के विस्तार तथा स्वयंसेवकों के बीच संघ की विचारधारा को स्थायी रूप से स्थापित करने हेतु प्रतिदिन लगभग आठ घंटे तक गहन विचार-विमर्श हुआ। इस बैठक का एक प्रमुख निर्णय प्रार्थना से संबंधित था। प्रार्थना को संघ के अंतिम उद्देश्य की निरंतर स्मृति माना जाता था। उस समय प्रचलित प्रार्थना मराठी और हिन्दी मिश्रित थी, परंतु जैसे-जैसे संघ का विस्तार पूरे भारत में हुआ, भाषाई विविधता के कारण इसे बदलने की आवश्यकता महसूस की गई। शाखा में दिए जाने वाले सभी आदेश भी मराठी में थे। जिन्हें सर्वमान्य भाषा में रूपांतरित करना आवश्यक हो गया था। इस संदर्भ में डॉ. हेडगेवार ने नानासाहेब टालाटुले को नई प्रार्थना का मसौदा तैयार करने का दायित्व सौंपा। निर्णय लिया गया कि नई प्रार्थना संस्कृत में होगी। क्योंकि संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं का मूल स्रोत है और संपूर्ण भारत को एकसूत्र में जोड़ने की क्षमता रखती है।
 
पुणे के संस्कृत शिक्षक श्री नरहरि नारायण भिड़े ने संस्कृत प्रार्थना ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ रची, जो आज संघ स्वयंसेवकों के लिए निरंतर प्रेरणा का स्रोत है। इस प्रार्थना की रचना इस प्रकार की गई कि यह सदैव स्वयंसेवकों को संघ के दीर्घकालिक उद्देश्य और उसके प्रति उनके कर्तव्यों की स्मृति दिलाती रहे तथा उन्हें प्रेरित करती रहे। डॉ. हेडगेवार के दृष्टिकोण को भी इस घटना से समझा जा सकता है। वे समय और परिस्थिति की सीमाओं से परे सोच रहे थे और यह स्पष्ट कर देना चाहते थे कि विचारधारा किसी भी व्यक्ति से बड़ी है। इसी क्रम में शाखाओं के आदेशों को भी संस्कृत में अंतिम रूप दिया गया। क्योंकि संघ का प्रसार उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों तक हो रहा था। आज भी संघ की शाखाओं में वही आदेश परंपरागत रूप से उपयोग किए जाते हैं। इस बैठक में कई बार तीखी बहसें भी हुईं और माहौल गरमाया। लेकिन डॉ. हेडगेवार की लोकतांत्रिक कार्यशैली उल्लेखनीय रही। वे प्रत्येक कार्यकर्ता को अपनी राय खुलकर रखने का अवसर देते थे और अंततः चर्चा के उपरांत निर्णय सर्वसम्मति से लिया जाता था।
 
यह बैठक लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आदर्श उदाहरण थी। इसने दर्शाया कि कैसे विभिन्न मतों के बावजूद लोग आपसी सहमति तक पहुँच सकते हैं। यह अनुशासन का भी एक अनूठा उदाहरण था, क्योंकि संगठन के अंतिम निर्णय पर कभी समझौता नहीं किया गया। संघ में इस प्रकार की बैठकें समय-समय पर होती रही हैं, जो सच्चे लोकतंत्र की मिसाल प्रस्तुत करती हैं। सिंदी बैठक में बदलती घरेलू और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के संदर्भ में संघ के विस्तार पर गहन विचार-विमर्श किया गया। बैठक के दौरान उन क्षेत्रों की पहचान की गई, जहाँ संघ का कार्य और अधिक फैलाया जा सकता था। इसी बैठक में श्री गुरुजी की कार्यशैली, उनका दृष्टिकोण और वैचारिक आधार स्पष्ट रूप से सामने आया। उन्होंने इस निर्णायक बैठक में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।