समयावधि
1925
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, जिन्हें आदरपूर्वक ‘डॉक्टर जी’ कहा जाता है, ने 27 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के पावन दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की घोषणा की। उस अवसर पर उन्होंने कहा, “आज हम संघ की स्थापना कर रहे हैं। हम सभी को चाहिए कि हम स्वयं को शारीरिक, बौद्धिक और हर दृष्टि से प्रशिक्षित करें, ताकि अपने पोषित लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ हो सकें।” संघ की औपचारिक शुरुआत नागपुर स्थित डॉ. हेडगेवार जी के आवास ‘सुक्रवारी’ में हुई। वहां रविवार को स्वयंसेवकों को शारीरिक अभ्यास, संचलन, आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था। जबकि गुरुवार और रविवार को राष्ट्रीय विषयों पर प्रेरक व्याख्यान आयोजित होते थे।
(यहाँ डॉ. हेडगेवार जी का चित्र लगा सकते हैं)
1926
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अंतिम नाम 17 अप्रैल, 1926 को हुई एक विशेष बैठक में तय किया गया, जिसे नवगठित संगठन के नाम को अंतिम रूप देने के लिए डॉक्टर जी के आवास पर बुलाया गया था। उस बैठक में जिन नामों पर विचार किया गया उनमें जरीपटका मंडल, भारतोद्धारक मंडल और हिंदू स्वयंसेवक संघ शामिल थे। विचार-विमर्श के बाद अंततः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम को स्वीकृति दी गई। इसके बाद 28 मई, 1926 को नागपुर के मोहिते वाड़ा में पहली दैनिक सभा (नित्य शाखा) आरंभ हुई। इस शाखा में लाठी/डंडे का उपयोग प्रारंभ हुआ और पहली बार ‘दक्ष’ तथा ‘आरम’ जैसे आदेशों का अभ्यास कराया गया। इसी सभा में स्वयंसेवकों ने भगवा ध्वज को वंदन कर सलामी दी। शाखा प्रार्थना के साथ समाप्त होती थी, जो हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं में गाई जाती थी। उसी वर्ष, 30 स्वयंसेवकों की सहभागिता के साथ पहला पथ संचलन भी आयोजित किया गया, जिसने संघ के संगठनात्मक स्वरूप और अनुशासन का प्रथम सार्वजनिक प्रदर्शन किया।
1927 के मई माह में ‘ओ.टी.सी.’ नाम से एक विशेष प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया, जिसमें कुल 17 प्रतिभागी सम्मिलित हुए।
1928
पहला गुरु दक्षिणा उत्सव आयोजित किया गया, जिसमें कुल 84 रुपये की राशि एकत्र हुई। इसी दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई श्री विट्ठलभाई पटेल ने नागपुर के मोहिते वाड़ा स्थित संघ शाखा का दौरा किया। उसी वर्ष मार्च में पहला प्रतिज्ञा समारोह संपन्न हुआ, जिसमें 99 स्वयंसेवकों के एक चयनित समूह ने भाग लिया। 1928 के अंत तक नागपुर शहर में 18 शाखाएँ सक्रिय हो चुकी थीं। इसी दौरान पहला शीतकालीन शिविर आयोजित किया गया और बैंड के साथ पहला पथ संचलन भी संपन्न हुआ। इसी वर्ष डॉक्टर जी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी के बीच एक ऐतिहासिक भेंट भी हुई, जो कांग्रेस पार्टी के कलकत्ता (अब कोलकाता) अधिवेशन के दौरान आयोजित हुई थी और लगभग एक घंटे तक चली।
1929
9 और 10 नवंबर को नागपुर के डोक मठ में एक बैठक हुई और उसमें डॉक्टर जी को प्रमुख (सरसंघचालक) के पद के साथ नामित किया गया। बालाजी हुद्दार को सरकार्यवाह (महासचिव) के रूप में चुना गया, जबकि मार्तंडराव जोग को मुख्य प्रशिक्षक के रूप में जिम्मेदारी दी गई।
1930
कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता (पूर्ण स्वराज) का प्रस्ताव पारित किया। इस अवसर पर डॉक्टर जी ने सभी शाखाओं को 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया। इसके बाद वे अनेक स्वयंसेवकों के साथ विदर्भ क्षेत्र में यवतमाल के निकट आयोजित जंगल सत्याग्रह में सम्मिलित हुए। इस सत्याग्रह में भाग लेने के कारण डॉक्टर जी को नौ महीने का कारावास भुगतना पड़ा। सत्याग्रह में जाने से पूर्व उन्होंने डॉ. एल. वी. परांजपे को सरसंघचालक नियुक्त किया। इसी वर्ष संघ के गणवेश में काली टोपी को औपचारिक रूप से शामिल किया गया।
(1931 से 1939 तक का विवरण नहीं है)
1934
- गांधी जी ने संघ शिविर का दौरा किया और डॉ. हेडगेवार के साथ चर्चा की
1939
- सिंदी (रेलवे) बैठक
1940
इस कालखंड में संघ से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण घटनाएँ घटित हुईं। वीर सावरकर ने पुणे में संघ की प्रांतीय बैठक में भाग लिया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जिन्होंने बाद में भारतीय जनसंघ की स्थापना की, नागपुर में डॉ. हेडगेवार से मिले और बंगाल में हिंदुओं की दयनीय स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। ब्रिटिश सरकार ने संघ के गणवेश और पथ-संचलन पर प्रतिबंध लगाया। इसी दौरान संघ की प्रार्थना ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि’ संस्कृत में आरंभ की गई। इससे पहले प्रार्थना मराठी और हिंदी में होती थी। साथ ही, संघ के आदेश भी अंग्रेज़ी के स्थान पर संस्कृत में दिए जाने लगे। 20 जून, 1940 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस नागपुर में डॉक्टर जी से मिले, जब वे मृत्युशय्या पर थे। अगले ही दिन, 21 जून, 1940 की सुबह 9:27 बजे डॉक्टर जी का निधन हो गया। इसके बाद माधव सदाशिव गोलवलकर, जिन्हें श्रद्धापूर्वक ‘श्री गुरुजी’ कहा जाता है, को संघ का दूसरा सरसंघचालक नियुक्त किया गया। इसी वर्ष, 2 जनवरी, 1940 को डॉ. भीमराव आंबेडकर ने महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में कराड स्थित शाखा का दौरा किया। डॉक्टर हेडगेवार के निधन की खबर 'जनता' वीकली में प्रकाशित हुई, जिसने समाज और स्वयंसेवकों को गहरे शोक में डाल दिया।
1941 (उल्लेख नहीं है)
1942
कांग्रेस ने अंग्रेज़ों से देश छोड़ने की माँग करते हुए भारत छोड़ो आंदोलन का शुभारंभ किया। संघ के अनेक कार्यकर्ताओं ने भी इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। महाराष्ट्र के आष्टी–चिमूर क्षेत्र में कुछ स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति दी। संघ के रामटेक नगर कार्यवाह श्री बालासाहेब देशपांडे को इस आंदोलन में सहभागिता के कारण मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई, जिसे बाद में ब्रिटिश सरकार ने निरस्त कर दिया।
1943, 1944 और 1945 (उल्लेख नहीं है) 1946
मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त को डायरेक्ट एक्शन (प्रत्यक्ष कार्रवाई) की घोषणा की। कलकत्ता में 5000 हिंदू मारे गए और 15,000 घायल हो गए।
1947
कांग्रेस ने 3 जून को देश का विभाजन स्वीकार कर लिया, जो हिंदू समाज के लिए एक बड़ा आघात था। इस निर्णय से संघ कार्यकर्ता गहरे सदमे में थे। विभाजन के दौरान पंजाब और बंगाल में असंख्य हिंदुओं का नरसंहार हुआ। ऐसे कठिन समय में संघ ने 3,000 राहत शिविरों का आयोजन किया और पीड़ितों की हर संभव सहायता की। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। इस अवसर पर गांधीजी ने दिल्ली की वाल्मीकि कॉलोनी में संघ के लगभग 500 स्वयंसेवकों को संबोधित किया। उसी वर्ष 17 अक्टूबर को श्री गुरुजी श्रीनगर पहुँचे और महाराजा हरि सिंह को कश्मीर के भारत में विलय करने की सलाह दी, जिससे उन्हें राज़ी किया जा सका। विदेशों में भी संघ की प्रेरणा पहुँची। केन्या में भारतीय स्वयंसेवक संघ नामक संगठन की स्थापना हुई। इसी वर्ष साप्ताहिक 'ऑर्गनाइजर' और 'पांचजन्य' पत्रिकाओं का प्रकाशन आरंभ किया गया।
1948
30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई। इस दुखद घटना पर संघ ने गहरा शोक व्यक्त किया। किंतु 1 फरवरी को नागपुर में श्री गुरुजी को गिरफ्तार कर लिया गया और अंतरिम सरकार ने हत्या के लिए संघ को दोषी ठहराते हुए संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया। 4 फरवरी को लगभग 17,000 स्वयंसेवकों को गिरफ्तार किया गया। इसके पश्चात 5 फरवरी को श्री गुरुजी ने सभी संघ शाखाओं को अस्थायी रूप से बंद करने की घोषणा की। यद्यपि संघ और सरकार के बीच बातचीत हुई, परंतु ठोस परिणाम नहीं निकले। स्वयंसेवकों ने 9 दिसंबर को प्रतिबंध हटाने की माँग करते हुए सत्याग्रह शुरू किया, लेकिन यह प्रयास भी असफल रहा।
1949 में
संघ का संविधान तैयार किया गया और औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया। इसके बाद सरकार ने 12 जुलाई, 1949 को संघ पर लगा प्रतिबंध बिना शर्त हटा दिया। अगले ही दिन, 13 जुलाई को श्री गुरुजी जेल से रिहा हुए। राष्ट्रव्यापी दौरे के दौरान उनका पूरे देश में भव्य स्वागत हुआ। इसी कालखंड में युवाओं की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करने और राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना की गई।
1950 में
26 जनवरी को भारत एक गणराज्य बना। इस ऐतिहासिक क्षण को मनाने के लिए श्री गुरुजी ने स्वयंसेवकों से विशेष आह्वान किया। इसी वर्ष पहली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा आयोजित हुई, जिसमें भैयाजी दानी को सरकार्यवाह (महासचिव) चुना गया। पाकिस्तान से पलायन कर आए हिंदू शरणार्थियों की सहायता के लिए वास्तुहारा सहायता समिति का गठन किया गया। इसके अतिरिक्त, असम में आए भूकंप और बाढ़ से प्रभावित लोगों को राहत के कार्यों में भी संघ स्वयंसेवकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया।
1951 (उल्लेख नहीं है)
1952
गोरक्षा आंदोलन पूरे देश में गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग के रूप में प्रारंभ हुआ था। इस अभियान के अंतर्गत स्वयंसेवकों ने देश के कोने-कोने में पहुँचकर 85,000 शहरों और गाँवों से 8,13,000 हस्ताक्षर एकत्र किए। इन हस्ताक्षरों को 8 दिसंबर को भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सौंपा गया। इसी वर्ष दो महत्वपूर्ण संगठनों, वनवासी कल्याण आश्रम और भारतीय जनसंघ की स्थापना की गई। भारतीय जनसंघ का शुभारंभ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा किया गया, जिसमें अनेक स्वयंसेवकों ने सक्रिय भागीदारी की। श्री गुरुजी ने भी पुणे में आयोजित ‘अभिनव भारत’ के समापन समारोह में भाग लिया। यह संगठन स्वातंत्र्य वीर सावरकर द्वारा भारत की स्वतंत्रता के लिए स्थापित किया गया था।
1953
भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वाले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु अप्रत्याशित और अत्यंत चौंकाने वाली थी। उन्हें अनुच्छेद 370 का उल्लंघन करने के कारण कश्मीर में गिरफ्तार किया गया था। 23 जून, 1953 को हिरासत में ही उनका निधन हो गया।
1954
दादरा और नगर हवेली, जो स्वतंत्रता के बाद भी पुर्तगाली शासन के अधीन थे, को 2 अगस्त को स्वयंसेवकों के प्रयासों से मुक्त कराया गया। जबकि देश का अधिकांश हिस्सा पहले ही स्वतंत्र हो चुका था। यह क्षेत्र विदेशी नियंत्रण में था। मुक्ति के उपरांत, स्वयंसेवकों ने इस नवमुक्त क्षेत्र को भारत सरकार को सौंप दिया।
1955
गोवा की मुक्ति के लिए पुर्तगाली शासन के विरुद्ध चलाए गए सर्वदलीय आंदोलन में बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने सक्रिय योगदान दिया। इसी वर्ष भारतीय मजदूर संघ की स्थापना भी की गई।
1956 में श्री एकनाथ रानाडे संघ के सरकार्यवाह चुने गए।
1963 में संघ को दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। संक्षिप्त सूचना के बावजूद, गणवेश और घोष वाद्यों के साथ लगभग 3,000 स्वयंसेवकों ने इस परेड में प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई। इसी वर्ष विवेकानंद शताब्दी समारोह का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर संघ ने कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद की स्मृति में एक भव्य स्मारक निर्मित करने का प्रस्ताव पारित किया।
1964
विश्व हिंदू परिषद की स्थापना 29 अगस्त को कृष्ण जन्माष्टमी के दिन की गई। इसका उद्देश्य विश्वभर में फैले हिंदुओं को पुनः संगठित कर सांस्कृतिक एवं धार्मिक एकता स्थापित करना था। उद्घाटन समारोह में अनेक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक नेता उपस्थित थे।
1965
पाकिस्तान द्वारा भारत पर किए गए आक्रमण के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने श्री गुरुजी को नई दिल्ली में आयोजित सर्वदलीय बैठक में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। इस अवसर पर श्री गुरुजी ने सरकार को संघ की ओर से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। इसी कालखंड में श्री मधुकर दत्तात्रेय (बालासाहेब) देवरस को संघ का सरकार्यवाह चुना गया। नागपुर–विदर्भ के प्रांतीय शिविर में 5,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
1966
बिहार भीषण सूखे की चपेट में था। इस संकट की घड़ी में संघ ने पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर राहत कार्य संचालित किए। स्वयंसेवकों की नि:स्वार्थ सेवा ने जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। यहाँ तक कि जयप्रकाश नारायण जैसे राष्ट्रीय नेता भी उनकी समर्पण भावना से प्रभावित हुए। इसी काल में विश्व हिंदू परिषद का पहला सम्मेलन प्रयाग में आयोजित किया गया। इस ऐतिहासिक आयोजन में 12 देशों से आए प्रतिनिधियों सहित लगभग 25,000 सहभागी उपस्थित रहे।
1967
महाराष्ट्र प्रांतीय शिविर में 10,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने भाग लिया। इस विराट आयोजन ने संघ के प्रति समाज के बढ़ते विश्वास को दर्शाया। शिविर में प्रशिक्षण, अनुशासन और संगठनात्मक क्षमता की अद्भुत झलक देखने को मिली।
1968
मध्य भारत प्रांतीय शिविर शाजापुर में आयोजित किया गया था। (1969 और 1970 के बारे में जानकारी नहीं है)
1971
विदर्भ-नागपुर प्रांतीय शिविर का आयोजन किया गया, जिसमें 10,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने भाग लिया। इसी समय पाकिस्तान के साथ तीसरा युद्ध छिड़ गया। संकट की इस घड़ी में स्वयंसेवकों ने राष्ट्र रक्षा हेतु सशस्त्र बलों की सहायता करने के लिए अनेक उल्लेखनीय प्रयास किए।
1972
कन्याकुमारी में विवेकानंद रॉक मेमोरियल का उद्घाटन भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री वी. वी. गिरि ने किया। यह स्मारक राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक जागरण का एक अद्वितीय प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद ने 25, 26 और 27 दिसंबर, 1892 को इसी चट्टान पर गहन ध्यान साधना की थी। यहीं से उन्हें राष्ट्र के पुनर्निर्माण की प्रेरणा मिली थी। आज यह स्मारक भारत के सर्वाधिक दर्शनीय स्थलों में से एक है और देशभक्ति तथा आध्यात्मिकता का संगम स्थल भी।
1973
5 जून को श्री गुरुजी का निधन हो गया। नागपुर स्थित डॉ. हेडगेवार स्मृति मंदिर के सामने उनका स्मारक निर्मित किया गया, जो आने वाली पीढ़ियों को उनके जीवन और योगदान की याद दिलाता है। अगले ही दिन, 6 जून को श्री बालासाहेब देवरस को संघ का तीसरा सरसंघचालक नामित किया गया।
1974
छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का त्रिशताब्दी समारोह पूरे देश में उत्साह और गर्व के साथ मनाया गया। छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है, जिसे राष्ट्र की स्वाभिमान गाथा के रूप में स्मरण किया जाता है। 6 जून, 1674 को रायगढ़ किले में शिवाजी महाराज का विधिवत् राज्याभिषेक किया गया था। यह राज्याभिषेक केवल एक राजकीय अनुष्ठान न होकर, “हिंदवी स्वराज्य” की उस महान अवधारणा की स्थापना का प्रतीक था, जिसमें स्व-शासन और जनता की भागीदारी का आदर्श निहित था।
1975
25 जून को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल घोषित किया। इसके कुछ ही दिनों बाद 4 जुलाई को संघ पर दूसरी बार प्रतिबंध लगा दिया गया। आपातकाल का विरोध करने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए लोक संघर्ष समिति का गठन किया गया। इस संघर्ष के दौरान बालासाहेब देवरस सहित हजारों स्वयंसेवकों को गिरफ्तार किया गया। संघ के अनेक नेता और कार्यकर्ता भूमिगत रहकर सक्रिय रहे और आपातकाल के विरुद्ध आंदोलन को निरंतर जीवित बनाए रखा।
1976
(उल्लेख नहीं है) हम संघ द्वारा आपातकाल के विरोध में लड़ी गई संघर्षपूर्ण लड़ाई का उल्लेख कर सकते हैं।
1977
भारतीय जनसंघ का नवगठित जनता पार्टी में विलय कर दिया गया, जो चुनावों में विजय प्राप्त कर सत्ता में आई। इसके बाद 22 मार्च को जनता पार्टी सरकार ने संघ पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया। 3 नवंबर को जयप्रकाश नारायण ने पटना में आयोजित संघ की एक सभा को संबोधित किया। इसी वर्ष दिसंबर में, आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में भयंकर चक्रवात आया, जिसके परिणामस्वरूप भारी जनहानि और विनाश हुआ। इस आपदा में भी स्वयंसेवकों ने प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच राहत कार्य करते हुए उल्लेखनीय सेवा की। प्रभावित परिवारों के बीच 2,40,000 कपड़े और 32,000 बर्तन वितरित किए गए। इसी समय प्रो. राजेंद्र सिंह, जिन्हें आदरपूर्वक रज्जू भैया कहा जाता है, को सह-सरकार्यवाह के रूप में नामित किया गया।
1978
30 सितंबर को तत्कालीन सरकार्यवाह श्री माधवराव मूले का निधन हो गया। इसके उपरांत प्रो. राजेंद्र सिंह को नया सरकार्यवाह चुना गया। इसी वर्ष दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की गई। मध्य भारत प्रांत का विशाल शिविर इंदौर में आयोजित हुआ, जिसमें लगभग 6,000 स्वयंसेवकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। यह आयोजन संगठन की शक्ति और एकजुटता का प्रेरणादायी उदाहरण बना।
1979
विश्व हिंदू परिषद का दूसरा सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें दलाई लामा सहित विश्वभर के अनेक प्रमुख धार्मिक नेतृत्व ने भाग लिया। यह सम्मेलन वैश्विक स्तर पर आध्यात्मिक एकता और संवाद का प्रतीक बना। इसी वर्ष अगस्त माह में गुजरात के मोरबी के पास माछू बाँध टूट जाने से भीषण बाढ़ आई। इस विनाशकारी आपदा में स्वयंसेवकों ने आगे बढ़कर राहत कार्य किए और लगभग 12,000 प्रभावित परिवारों को संकट की घड़ी में सहारा प्रदान किया।
1980
संघ ने एक व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया, जिसके अंतर्गत 95,000 गाँवों और एक करोड़ परिवारों तक पहुँच बनाई गई। इस बीच, जनता पार्टी के कुछ नेतृत्व ने यह आपत्ति उठाई कि संघ का कोई भी स्वयंसेवक जनता पार्टी की सदस्यता नहीं ले सकता। उन्होंने दोहरी सदस्यता का विरोध करते हुए स्पष्ट रूप से मांग की कि जनता पार्टी और संघ की सदस्यता एक साथ मान्य न हो। इसी विवाद और वैचारिक मतभेद के परिणामस्वरूप, एक नए राजनीतिक संगठन—भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ।
1981
तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में लगभग 800 हिंदुओं का इस्लाम में धर्मान्तरण कर लिया गया। संघ ने अन्य हिंदू संगठनों के साथ मिलकर इसका प्रचंड विरोध किया। इसके पश्चात तमिलनाडु के अन्य क्षेत्रों से भी धर्मांतरण की कई घटनाएँ सामने आईं। इन परिस्थितियों को देखते हुए धर्मांतरण के विरुद्ध जागरूकता अभियान चलाए गए और समाज में सांस्कृतिक चेतना जगाने के प्रयास किए गए। इसी काल में ‘संस्कार भारती’ की शुरुआत हुई, जिसका उद्देश्य भारतीय कला, संस्कृति और परंपराओं को जन-जन तक पहुँचाना है।
1982
कर्नाटक का प्रांतीय शिविर बैंगलोर में आयोजित किया गया। 25,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने उसमें भाग लिया।
1983
भारत माता और गंगा माता के प्रति आस्था और भक्ति को जाग्रत करने के उद्देश्य से विश्व हिंदू परिषद ने स्वयंसेवकों के सक्रिय सहयोग से एकात्मता यज्ञ का आयोजन किया। यह आयोजन सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना। इसी वर्ष महाराष्ट्र प्रांतीय शिविर का आयोजन पुणे में हुआ, जिसमें 35,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। यह शिविर संगठन की शक्ति, अनुशासन और एकजुटता का अद्वितीय उदाहरण था।
1984
अक्टूबर में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में सिख समुदाय को भारी जन-हानि और संपत्ति का नुकसान झेलना पड़ा। सैकड़ों सिख परिवारों को स्वयंसेवकों ने अपने घरों में सुरक्षित आश्रय दिया। जरूरतमंदों के लिए राहत शिविर स्थापित किए गए और दिल्ली सहित देश के अन्य हिस्सों में उनके घरों तक आवश्यक सेवाएँ पहुँचाई गईं। अमृतसर में ऑपरेशन ब्लू-स्टार के बाद स्वर्ण मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य आरंभ हुआ, जिसमें कार सेवा के दौरान बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने सक्रिय भागीदारी की।
1985
संघ के 60 वर्ष पूर्ण होने पर पूरे देश में जागरूकता अभियानों का आयोजन किया गया, जिनके माध्यम से उसकी यात्रा, कार्य और समाजसेवा का संदेश जन-जन तक पहुँचाया गया।
1986
श्री हो.वे. शेषाद्री को सरकार्यवाह चुना गया। सरसंघचालक श्री बालासाहेब देवरस ने 6 दिसंबर को चैत्य भूमि पहुँचकर डॉ. भीमराव आंबेडकर को श्रद्धांजलि अर्पित की।
1989
डॉ. हेडगेवार के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में जनसंपर्क अभियान चलाया गया, जिसके अंतर्गत स्वयंसेवकों ने 1,50,000 परिवारों से संपर्क किया, 76,000 बैठकों का आयोजन किया और सेवा निधि के रूप में 11 करोड़ रुपये एकत्रित किए। 25 जून को पंजाब के मोगा शहर में संघ शाखा पर आतंकवादियों ने हमला किया, जिसमें 18 स्वयंसेवकों सहित कुल 24 लोगों की मृत्यु हो गई और 28 अन्य घायल हो गए
1990
मुलायम सिंह यादव सरकार द्वारा लगाए गए सभी प्रकार के प्रतिबंधों को चुनौती देते हुए 30 अक्टूबर को अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि में कार सेवा का आयोजन किया गया था।
1991 (उल्लेखित नहीं)
1992
श्री भाऊराव देवरस का 14 मई को निधन हो गया। श्री यादवराव जोशी का 20 अगस्त को निधन हो गया। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर विवादित ढाँचे को कारसेवकों द्वारा 6 दिसंबर को हटा दिया गया। सरकार ने 10 दिसंबर को तीसरी बार संघ पर प्रतिबंध लगाया।
1993
पी.के. बाहरी ट्रिब्यूनल ने संघ पर लगाए गए प्रतिबंध को अनुचित ठहराया, जिसके बाद 4 जून को प्रतिबंध हटा लिया गया। इसी अवधि में अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद की स्थापना की गई।
1994
11 मार्च को प्रो. राजेंद्र सिंह, जिन्हें आदरपूर्वक रज्जू भैया नाम से जाना जाता है, को संघ का चौथा सरसंघचालक नामित किया गया। इसी अवधि में लघु उद्योग भारती की स्थापना हुई।
1995 (उल्लेखित नहीं)
1996
17 जून को श्री बालासाहेब देवरस का निधन हुआ। नवंबर में आंध्र प्रदेश के गोदावरी जिलों में आए भीषण चक्रवात में 900 लोगों की मृत्यु हुई और भारी संपत्ति का नुकसान हुआ। जनसंवेदना समिति के बैनर तले संघ ने राहत कार्यों में सक्रिय भागीदारी की। इसी वर्ष हरियाणा के चरखी दादरी में हुई विमान दुर्घटना में 350 लोगों की जान चली गई, जिसमें राहत कार्यों में संघ की उल्लेखनीय भूमिका की अंतरराष्ट्रीय मीडिया, विशेषकर खाड़ी देशों में, व्यापक प्रशंसा हुई।
1997
सरसंघचालक श्री रज्जू भैय्या ने 10 से 17 जनवरी तक केन्या हिंदू परिषद के निमंत्रण पर केन्या का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने भारतीय परिवारों और विश्वविद्यालय छात्रों की अनेक सभाओं को संबोधित किया तथा कई सरकारी अधिकारियों से भेंट की। इसी वर्ष लुधियाना में स्वर्ण जयंती संघ समागम का आयोजन हुआ। एक ही दिन में 21,000 स्वयंसेवक एकत्रित हुए।
1998
17 अप्रैल को सरसंघचालक श्री रज्जू भैय्या जी ने जापान का दौरा कर भारत-जापान सांस्कृतिक केंद्र के निर्माण हेतु भूमि-पूजन किया। 25 दिसंबर को मुंबई में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के स्वर्ण जयंती समारोह का भव्य उद्घाटन संपन्न हुआ।
1999
6 अगस्त को त्रिपुरा में एन.एल.एफ.टी. के आतंकवादियों ने चार संघ के पूर्णकालिक प्रचारकों दिनेंद्रनाथ देव, श्यामल कांति सेन, शुभंकर चक्रवर्ती और सुधायमय दत्ता का अपहरण कर दो करोड़ रुपये की फिरौती की माँग की। बाद में इन चारों की हत्या कर दी गई। इसी वर्ष 28 अक्टूबर को सदी का सबसे विनाशकारी चक्रवात उड़ीसा के तट से टकराया, जिसमें 10,000 लोगों की जान गई और लगभग 1,800 करोड़ रुपये की संपत्ति नष्ट हो गई। राहत और पुनर्वास कार्यों में संघ ने 'उत्कल बिपन्न सहायता समिति' के बैनर तले प्रमुख भूमिका निभाई। (2000–2006 नहीं है)
2007
स्वयंसेवकों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं वर्षगांठ पूरे उत्साह के साथ मनाई। प्रयागराज में तृतीय विश्व हिंदू सम्मेलन का आयोजन हुआ तथा श्री गुरुजी की जन्मशताब्दी का समापन समारोह दिल्ली में संपन्न हुआ। वर्षभर देश के विभिन्न स्थलों पर हिंदू सभाएँ आयोजित की गईं, जिनमें 1.6 करोड़ से अधिक नागरिकों, 13,000 संतों और 1.8 लाख सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।
2008 (नहीं है)
2009
पूजनीय सरसंघचालक श्री के. एस. सुदर्शन ने डॉ. मोहन भागवत को संघ का छठा सरसंघचालक नामित किया। सुरेश भैयाजी जोशी को संघ का सरकार्यवाह चुना गया। प्रमुख संतों द्वारा ‘विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा’ का शुभारंभ किया गया, जिसका उद्देश्य गोरक्षा के महत्व के बारे में समाज में जागरूकता फैलाना था। इस अभियान को संघ का सक्रिय समर्थन प्राप्त हुआ। इस विशाल अभियान के अंतर्गत 8 करोड़ 34 लाख लोगों ने गोरक्षा के पक्ष में हस्ताक्षर किए, जिनमें 75,668 ईसाई और 10,73,142 मुसलमान भी शामिल थे। देशभर के 23,300 गाँवों में कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें लगभग 11 लाख लोगों ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त, 201 सांसदों और 867 विधायकों ने गोरक्षा के लिए ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। 1,23,796 स्थानों पर जुलूस निकाले गए, जिनमें लगभग 1.50 करोड़ लोगों ने भागीदारी की। समाज को जाग्रत करने के लिए विशेष ‘गौ संरक्षण यात्रा’ 28 सितंबर 2009 को कुरुक्षेत्र से प्रारंभ हुई और 17 जनवरी, 2010 को नागपुर में संपन्न हुई। इस यात्रा ने कुल 26,000 किलोमीटर की दूरी तय की। यात्रा को सफल बनाने में 9,271 पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं और लगभग 1.40 लाख कार्यकर्ताओं ने योगदान दिया। इस यात्रा में 15 लाख से अधिक लोगों ने अपनी सहभागिता प्रदान की।
2010
उत्तर कर्नाटक की भीषण बाढ़ से अनेक गाँव प्रभावित हुए। संघ ने तुरंत राहत कार्य शुरू करते हुए 180 गाँवों में आवश्यक सामग्री पहुँचाई। लगभग 2,400 स्वयंसेवक दिन-रात सक्रिय रहे। प्रभावित लोगों के पुनर्वास हेतु सेवा भारती के बैनर तले नौ गाँवों में 1,680 घरों के निर्माण का संकल्प लिया गया। इसी दौरान पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने राष्ट्रव्यापी दौरा किया, जिसमें प्रत्येक कार्यक्रम में स्वयंसेवकों की भारी उपस्थिति रही। विशेषकर केरल, मंगलुरु और महाकौशल जैसे क्षेत्रों में अत्यंत उत्साहजनक भागीदारी देखने को मिली।
2011
फरवरी माह में मंडला में ‘माँ नर्मदा सामाजिक कुंभ’ का भव्य आयोजन हुआ, जिसने समाज की अद्भुत शक्ति का परिचय कराया। यह कुंभ सामाजिक बुराइयों और हिंदू समाज को कमजोर करने के प्रयासों के विरुद्ध जन-जागरण हेतु आयोजित किया गया था। इस आयोजन में देश के 336 जिलों की 1179 तहसीलों के 4000 गाँवों से आए 415 विभिन्न अनुसूचित जाति एवं जनजाति समूहों तथा 400 अन्य सामाजिक वर्गों ने भागीदारी की। तीन दिनों तक चले इस महाकुंभ में लगभग 30 लाख लोगों की उपस्थिति रही।
2012 में
सुरेश भैयाजी जोशी को पुनः संघ का सरकार्यवाह निर्वाचित किया गया।
2013
संघ ने स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती के अवसर पर उनके संदेश को पूरे देश में पहुँचाने हेतु सक्रिय सहयोग दिया। इस उद्देश्य से विवेकानंद केंद्र के साथ समन्वय स्थापित किया गया तथा रामकृष्ण मिशन, गायत्री परिवार, शारदा मठ, चिन्मय मिशन, स्वामीनारायण संप्रदाय और जैन संस्थानों जैसे अनेक आध्यात्मिक संगठनों के साथ मिलकर राष्ट्रनिर्माण के उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए व्यापक प्रयास किए गए। इन कार्यक्रमों में प्रख्यात शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, रक्षा अधिकारियों और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों ने भी सक्रिय भागीदारी की। इसी कालखंड में उत्तराखंड की चारधाम यात्रा के दौरान इतिहास की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदा का सामना किया। प्रभावित क्षेत्रों में सबसे पहले पहुँचकर संघ स्वयंसेवकों ने भारतीय सेना के साथ समन्वय में राहत और पुनर्वास कार्यों में सहयोग दिया।
वृत्तांत में 2014 और 2015 का उल्लेख नहीं किया गया है।
2016
जनवरी के महीने में बेंगलुरु में पहला श्रृंग शिविर "स्वरांजलि" आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में देश के हर हिस्से से कुल 2195 स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने संघ की 90 साल पुराने गणवेश को बदलने का निर्णय लिया। इसमें खाकी निक्कर को पूर्ण भूरे रंग की पेंट से प्रतिस्थापित किया गया।
2017 (यहाँ पाठ को पूरी तरह से परिवर्तित करने की आवश्यकता है। वर्तमान में यह समापन टिप्पणी जैसा प्रतीत होता है, जबकि 2025 तक इसे वर्षवार प्रमुख घटनाओं के उल्लेख के साथ निरंतर आगे बढ़ाना आवश्यक है।)
1925 से अब तक संघ ने भारत का एकमात्र निरंतर विकसित होता आंदोलन बनने की दिशा में एक लंबा सफर तय किया है। यह यात्रा उतार-चढ़ाव से रहित नहीं रही, किंतु संघ ने हर चुनौती का सामना जमीनी स्तर पर चुपचाप कार्य करते हुए व्यक्ति से व्यक्ति संपर्क और हृदय से हृदय संवाद के माध्यम से किया। समय-समय पर इसके प्लेंरयास अलग-अलग रहे। आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा का संघर्ष हो या हाल के दशकों में समाजसेवा के सशक्त प्रकल्प,इन सबका सामूहिक प्रभाव रहा। संघ की विशिष्ट कार्यशैली के कारण इसकी उपलब्धियों के मील के पत्थर केवल एक व्यापक दृष्टिकोण से ही समझे जा सकते हैं।