संघ स्थापना की पृष्ठभूमिः संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु चले आंदोलनों सहित विभिन्न आंदोलनों से निकटता से जुड़े थे। वे 'अनुशीलन समिति' के माध्यम से क्रांतिकारियों में भी शामिल थे। वे गहन विचार के बाद संघ की शुरुआत करने के निष्कर्ष पर पहुंचे थे। उनका उद्देश्य बहुत स्पष्ट था – हिंदुओं को संगठित करना। डॉ. हेडगेवार ने भारत की तत्कालीन दयनीय स्थिति के लिए मुख्य रूप से तीन कारण खोजे थे और वे तीन कारण थे:
आत्मविस्मृति, व्यक्तिवादी स्वार्थ और सामूहिक अनुशासन एवं क्रियाशीलता का अभाव।
समाज हिंदुत्व और उसके गौरवशाली इतिहास से विमुख हो गया है और लोग अपने सामाजिक कर्तव्यों व उत्तरदायित्वों को विस्मृत कर बैठे हैं।
हिंदू, जो यहाँ पीढ़ियों और सदियों से बसे हुए हैं, जाति सहित अनेक आधारों पर विभाजित हो गए थे। यह स्थिति शाश्वत हिंदू विचारधारा के लोकाचार के विपरीत थी, किंतु समय के साथ यह प्रवृत्ति समाज को अपंग और निर्बल बनाती चली गई। जातीय संवेदनशीलता अधिक प्रबल हो गई थी और हिंदुत्व की भावना क्षीण पड़ गई। जनता यह भूल चुकी थी कि भारत का भविष्य अनिवार्य रूप से हिंदुत्व की सुदृढ़ स्थिति से ही जुड़ा हुआ है। हिंदुओं ने सामूहिक कार्रवाई से दूरी बना ली थी और संगठन के अभाव में स्थिति सुधारने के प्रयास सफल नहीं हो पाए। केवल कुछ मुट्ठीभर लोग ही सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्यों में योगदान कर रहे थे, जो अपर्याप्त था। इसी पृष्ठभूमि में मुसलमानों और अंग्रेजों ने आक्रमण किये। इसके परिणामस्वरूप देशभक्ति की एक भावना अवश्य जागी, परंतु उसका स्वरूप मुख्यतः नकारात्मक ही रहा।
उस समय समाज में रचनात्मक भावना का गंभीर अभाव था। भारत अत्यधिक हतोत्साहित होकर अपनी अंतर्निहित शक्तियों और संपत्तियों को भूल चुका था तथा आत्म-आलोचना में उलझ गया था। आत्मसम्मान, जो किसी भी राष्ट्रीय जागृति का मूल तत्व है, पीढ़ियों से लुप्तप्राय था। संगठन, स्वतंत्रता या किसी ठोस आंदोलन के अभाव में ऐसे प्रयास लंबे समय तक टिक नहीं पाए। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी अधिकांश नेता या तो पश्चिमी विचारधाराओं से गहरे प्रभावित थे या उनसे प्रेरणा ग्रहण करते थे। उनके मन में राष्ट्र का स्वरूप स्पष्ट न होकर एक भ्रामक कल्पना मात्र रह गया था।
पश्चिमी विचार भारत की परिस्थितियों में उपयुक्त नहीं थे। भारत और पश्चिम के बीच सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर गहरे मतभेदों के बावजूद पश्चिमी विचारों को यहाँ लागू करने के प्रयास लगातार होते रहे, क्योंकि उन्हें रोकने के लिए संगठित प्रतिरोध का अभाव था। स्वतंत्रता संग्राम में ‘स्व’ की भावना का अभाव था, जो किसी भी सशक्त आंदोलन की मूलभूत पूर्व शर्त होती है। इस पृष्ठभूमि में अनेक घटनाओं ने जनता का मनोबल और भी कमजोर कर दिया था। इनमें प्रमुख थीं 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की विफलता, कांग्रेस का गठन (जो मुख्यतः एक सुरक्षा कवच की भूमिका निभा रही थी), ब्रिटिशों की विभाजन और शासन की नीति, 1905 में बंगाल का विभाजन तथा 1906 में मुस्लिम लीग का गठन। डॉ. हेडगेवार का दृढ़ विश्वास था कि राष्ट्र को जीवन के सभी क्षेत्रों में सशक्त और समृद्ध बनाने का एकमात्र स्थायी उपाय हिंदुओं का संगठन और उनकी जागृति है। इसी उद्देश्य से उन्होंने राष्ट्र को ‘परम वैभव’ की स्थिति तक पहुँचाने के संकल्प के साथ संघ की स्थापना की।
विकासः
संघ की स्थापना विजयादशमी के दिन 27 सितंबर, 1925 को डॉ. हेडगेवार तथा कुछ स्वयंसेवकों की उपस्थिति में हुई। ये सभी प्रतिदिन नागपुर स्थित महाराष्ट्र व्यायामशाला में एकत्रित होते थे। प्रत्येक गुरुवार को वहाँ राजनीतिक चर्चाएँ होती थीं, जिन्हें उस समय 'राजकीय वर्ग' कहा जाता था। आगे चलकर यही परंपरा 'बौद्धिक वर्ग' के रूप में जानी गई।
पहली शाखा 28 मई, 1926 को नागपुर के मोहिते वाड़ा में आयोजित की गई। कुछ ही महीनों में शाखाओं की संख्या में वृद्धि होने लगी। नागपुर के बाहर पहली शाखा उसी वर्ष डॉ. हेडगेवार की उपस्थिति में वर्धा में आरंभ हुई। 19 दिसंबर, 1926 को सभी संघचालकों (स्थानीय प्रमुखों) ने सर्वसम्मति से डॉ. हेडगेवार को संघ का प्रमुख चुना। 1927 में पहला अधिकारी प्रशिक्षण शिविर (ओ.टी.सी.) आयोजित हुआ, जिसमें प्रतिभागियों को ‘दंड’, ‘तलवार’ और ‘भाला’ का प्रशिक्षण दिया गया। सेना के अनुशासन से प्रेरणा लेकर शिविर में स्वयंसेवकों के लिए वर्दी लागू की गई और पहली बार पथ संचलन भी आयोजित किया गया। 1928 में पहली बार गुरुपूर्णिमा का उत्सव मनाया गया तथा उसी वर्ष पहली बार प्रतिज्ञा का कार्यक्रम भी संपन्न हुआ।
1928 में पहला शीतकालीन शिविर आयोजित किया गया, जिसमें ‘घोष’ के साथ पथ संचलन निकाला गया। इस संचलन के दौरान ‘झंडा हिंदू राष्ट्र का, झंडा भारत वर्ष का’ गीत गाया गया। जो आगे चलकर संघ में अत्यंत लोकप्रिय हुआ। 10 नवंबर, 1929 को डॉ. हेडगेवार को पहला ‘सरसंघचालक प्रणाम’ अर्पित किया गया। इसी वर्ष संघ के कार्य में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली ‘प्रचारक प्रणाली’ की शुरुआत हुई। 1930 में डॉ. हेडगेवार ने जंगल सत्याग्रह में सक्रिय भागीदारी की। अपनी संभावित गिरफ्तारी और कारावास को देखते हुए उन्होंने विवेकपूर्ण ढंग से सरसंघचालक की जिम्मेदारी पहले ही डॉ. लक्ष्मणराव परांजपे को सौंप दी थी।
डॉ. हेडगेवार चाहते थे कि किसी भी परिस्थिति या बाह्य बाधा के बावजूद संघ का कार्य निर्बाध रूप से चलता रहे। इसी उद्देश्य से उन्होंने डॉ. परांजपे को सरसंघचालक नियुक्त किया ताकि उनकी अनुपस्थिति में भी संघ का कार्य बिना किसी अवरोध के जारी रह सके। डॉ. हेडगेवार की ही भाँति अनेक कार्यकर्ताओं ने व्यक्तिगत स्तर पर स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी की और देश को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने को ही अपना जीवन-लक्ष्य बनाया। वर्ष 1934 में महात्मा गांधी ने वर्धा के शीतकालीन शिविर का दौरा किया और यह देखकर गहराई से प्रभावित हुए कि वहाँ जाति-भेद का कोई पालन नहीं होता था। 1934 तक संघ की ओ.टी.सी. नागपुर में ही आयोजित होती थी, किंतु 1935 में नागपुर के बाहर पहली ओ.टी.सी. पुणे में आयजित हई, जिसमें प्रथम और द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण दिया गया। 1938 में लाहौर में भी प्रथम और द्वितीय वर्ष के लिए ओ.टी.सी. आयोजित हुई। 1939 में वर्धा जिले के सिंदी में आयोजित एक बैठक में संस्कृत आदेशों और संस्कृत प्रार्थना को अंतिम रूप दिया गया, जिसे 1940 से लागू किया गया (इस बैठक पर एक अलग लेख उपलब्ध है।) इसी वर्ष हजारों स्वयंसेवकों ने निज़ाम की हिंदू विरोधी नीतियों के विरुद्ध आंदोलन में भाग लिया। संक्षिप्त बीमारी के बाद डॉ. हेडगेवार का निधन हो गया। उन्होंने माधव सदाशिव गोलवलकर (जिन्हें आदरपूर्वक 'गुरुजी' कहा जाता है) को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। वे संघ के दूसरे सरसंघचालक बने। 1942 में ब्रिटिश सरकार ने सेना जैसी सभी वर्दियों पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसके पश्चात् संघ ने अपनी वर्दी में आवश्यक परिवर्तन किए।
नई वर्दी में सफेद कमीज, सफेद जूते और नीले मोजे शामिल थे। 1945 में वर्दी को पुनः परिवर्तित कर ‘पाटिस पुंगली’ और लंबे जूतों को सम्मिलित किया गया। 1974 में वर्दी में फिर संशोधन किया गया। जबकि 2016 में खाकी निक्कर को पूर्ण भूरे रंग की पैंट से प्रतिस्थापित किया गया। 1947 के विभाजन के समय आर.एस.एस. ने व्यापक स्तर पर राहत कार्य किए, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को शरण और सहयोग की आवश्यकता थी। उसी वर्ष सरदार वल्लभभाई पटेल के आग्रह पर श्री गुरुजी ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह से भेंट की, जिसके परिणामस्वरूप महाराजा ने भारत के साथ रहने का निर्णय लिया। हालाँकि, जनवरी 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद फरवरी में संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस पृष्ठभूमि में श्री गुरुजी ने संगठन को भंग करने की घोषणा की।
हालाँकि संघ ने इस प्रतिबंध का कड़ा विरोध किया और स्पष्ट किया कि जिन कारणों के आधार पर उस पर प्रतिबंध लगाया गया, उनसे उसका कोई संबंध नहीं है। संगठन ने स्वयं को उन घटनाओं से पूरी तरह अलग बताया। बाद में, दिसंबर 1948 में दिल्ली में प्रतिबंध के विरोध में संघ ने सत्याग्रह प्रारंभ किया, जिसका नेतृत्व तत्कालीन सरकार्यवाह भैयाजी दाणी ने किया। इस सत्याग्रह में लगभग 78,000 कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। यह आंदोलन 21 फरवरी, 1949 को निलंबित कर दिया गया और अंततः 12 जुलाई, 1949 को संघ पर से प्रतिबंध हटा लिया गया। इसी अवधि में संघ का संविधान अस्तित्व में आया। इसी दौरान सरकार ने महात्मा गांधी की हत्या की जाँच के लिए न्यायमूर्ति आत्माचरण की अध्यक्षता में एक समिति का गठन भी किया।
समिति ने 10 जनवरी, 1949 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि संघ महात्मा गांधी की हत्या में किसी प्रकार शामिल नहीं था। पंजाब उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति खोसला ने भी स्वतंत्र जाँच कर इसी निष्कर्ष की पुष्टि की। 1969 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टी.एस. कपूर ने भी यही मत व्यक्त किया। (आयोग की रिपोर्टों की हाइपरलिंक प्रतियाँ उपलब्ध हैं)। 1932 में ‘बैन संघ प्रस्ताव’ के अंतर्गत रमाबाई ताम्बे द्वारा संघ पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव किया गया था (इस संदर्भ में राकेश सिन्हा की पुस्तक में विस्तार से चर्चा की गई है)। उल्लेखनीय है कि उस समय केंद्र सरकार ने संघ की गतिविधियों में सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी पर रोक लगाने की घोषणा की थी, किंतु यह स्वयं संघ पर लगाया गया प्रतिबंध नहीं था। पचास के दशक में स्वयंसेवकों ने श्री गुरुजी से प्रेरणा ग्रहण कर राष्ट्र के विविध क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ किया। परिणामस्वरूप अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय जनसंघ, भारतीय मजदूर संघ तथा अनेक सामाजिक संगठनों ने अपने-अपने क्षेत्रों मंस सक्रिय कार्य करना शुरू किया।
समय के साथ स्वयंसेवकों ने अनेक संगठनों की स्थापना की, जिन्हें अब सामूहिक रूप से ‘संघ सृष्टि’ कहा जाता है और जिनकी संख्या आज लगभग 32 है। संघ एक संगठन के रूप में निरंतर प्रगति करता रहा है और उसने असम भूकंप, बिहार बाढ़, गोरक्षा आंदोलन तथा कश्मीर में राहत कार्यों जैसी विभिन्न सेवाओं में सक्रिय रूप से भागीदारी की। अगस्त 1954 में विनायकराव आप्टे के नेतृत्व में 100 स्वयंसेवकों का एक दल दादरा और नगर हवेली की मुक्ति में सहायक बना। 1962 में नागपुर के रेशिमबाग में डॉ. हेडगेवार का नया स्मारक उद्घाटित हुआ। अगले वर्ष, श्री एकनाथ रानाडे को कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद स्मारक के निर्माण का दायित्व सौंपा गया। 5 जून, 1973 को श्री गुरुजी का निधन हुआ और उनके पश्चात् बालासाहेब देवरस को सरसंघचालक नियुक्त किया गया। 1974 में आपातकाल लागू हुआ और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। संघ की पहल पर ‘लोक संघर्ष समिति’ का गठन हुआ, जिसने आपातकाल के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व किया। इस दौरान संघ के शीर्ष नेतृत्व सहित हजारों कार्यकर्ताओं को मीसा कानून के तहत कारावास में डाल दिया गया। 22 मार्च, 1977 को आर.एस.एस. से प्रतिबंध हटा लिया गया। प्रतिबंध हटने के बाद संघ कार्यकर्ताओं ने नए उत्साह और संकल्प के साथ अपना कार्य पुनः प्रारंभ किया और 1977 में जनता को जाग्रत करने हेतु एक राष्ट्रीय स्तर का विशेष अभियान चलाया।
संघ ने 1988–89 में डॉ. हेडगेवार की जन्मशताब्दी मनाई, जिस परिणामस्वरुप ‘सेवाकार्यों’ का एक विशाल नेटवर्क आरंभ किया गया। दिसंबर 1992 में अयोध्या के विवादित ढाँचे के ध्वंस के बाद संघ पर तीसरी बार प्रतिबंध लगाया गया। हालाँकि जून 1993 में यह प्रतिबंध हटा लिया गया। प्रतिबंध हटने के दिन को पूरे देश में ‘चेतना दिवस’ के रूप में मनाया गया। 10 मार्च, 1994 को प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) को संघ का चौथा सरसंघचालक नियुक्त किया गया। 10 मार्च, 2000 को रज्जू भैया ने श्री के. एस. सुदर्शन को पाँचवें सरसंघचालक के रूप में नामित किया। उसी वर्ष संघ ने अपनी स्थापना के 75 वर्ष पूर्ण होने पर ‘संपर्क अभियान’ के नाम से एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम चलाया, जिसके अंतर्गत चार लाख से अधिक गाँवों तक पहुँचा गया। श्री गुरुजी की जन्मशताब्दी के अवसर पर सामाजिक सद्भाव पर विशेष बल देते हुए पूरे देश में ‘हिंदू सभाओं’ का आयोजन किया गया और उस वर्ष को ‘सामाजिक समरसता वर्ष’ घोषित किया गया। अंततः 21 मार्च, 2009 को श्री के. एस. सुदर्शन ने डॉ. मोहन भागवत जी को संघ का छठा सरसंघचालक नियुक्त किया।