अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद की स्थापना 7 सितंबर, 1991 को हुई। यह विधि व्यवसायियों का एक राष्ट्रीय संगठन है, जो औपनिवेशिक काल की भारतीय न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए प्रतिबद्ध है और इसे भारतीय परंपराओं, मूल्यों और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना चाहता है। परिषद् का मानना है कि ब्रिटिश काल की कानूनी विरासत और भारतीय सभ्यतागत मूल्यों के बीच एक बड़ी खाई है। इसलिए परिषद् एक ऐसी न्याय व्यवस्था विकसित करने का प्रयास कर रही है, जो स्वदेशी दर्शन पर आधारित हो और साथ ही आधुनिक और प्रभावी भी हो।
अधिवक्ता परिषद् विधि जगत में आदर्शवाद को प्रेरित करने, बार और न्यायपालिका की गुणवत्ता सुधारने और विशेषकर हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए न्याय व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी बनाने का कार्य करती है। संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक विषयों पर सेमिनार, संगोष्ठी और व्याख्यानों के माध्यम से यह अधिवक्ताओं को भारतीय भावना के साथ न्याय सेवा के लिए तैयार करती है। संपूर्ण भारत में अपनी मजबूत उपस्थिति के साथ अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद् राष्ट्रीय परिषदें, सम्मेलन और निरंतर शैक्षिक कार्यक्रम आयोजित करती है। यह अध्ययन मंडलों का आयोजन और त्रैमासिक पत्रिका 'न्यायप्रवाह' का प्रकाशन भी करती है।
परिषद् 'न्याय केंद्रों' के माध्यम से नि:शुल्क कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराती है। महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देने के साथ-साथ यह जनहित याचिकाओं व सामाजिक प्रयासों के जरिए वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए आवाज उठाती है। कानून निर्माण, न्याय वितरण और पीड़ितों के हितों की वकालत में परिषद् की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। :परिषद का मानना है कि अधिवक्ता न्याय और सामाजिक व्यवस्था के अग्रिम रक्षक हैं। अधिवक्ता परिषद् भारत की 'सज्जन शक्ति' यानी धर्म और न्याय आधारित ऊर्जा का सामूहिक स्वरूप है।