संघ की विचारधारा क्या है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ    30-Sep-2026
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी शक्ति और दिशा हिंदुत्व के मूलभूत दर्शन से ग्रहण करता है, जो वास्तव में सनातन संस्कृति का सार है
 — भारत की शाश्वत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर। यह दर्शन किसी एक पुस्तक, पैगंबर या कालखंड की उपज नहीं है, यह सदियों के जीवनानुभव, गहन चिंतन और सामंजस्यपूर्ण सहअस्तित्व से उपजे ज्ञान का निचोड़ है।
 
सनातन संस्कृति सत्य पर आधारित है — न केवल तथ्यात्मक सत्य, बल्कि गहन, शाश्वत सत्य, जो पूरी सृष्टि में व्याप्त है। यह विविधता को स्वीकार करता है, विभिन्न मार्गों का स्वागत करता है और अंतिम की खोज के सभी रूपों को अपनाता है। यही कारण है कि हिंदुत्व स्वाभाविक रूप से उदार है, कभी भी अलगाववादी नहीं। यह लोगों को विश्वास प्रणालियों के आधार पर विभाजित नहीं करता है, बल्कि उन्हें साझा मूल्यों और सभी अस्तित्वों के प्रति सम्मान के साथ एकजुट करता है।
 
भारत आधुनिक संदर्भ में केवल एक राष्ट्र-राज्य नहीं है; यह एक चिरंजीवी राष्ट्र है — एक जीवित, शाश्वत राष्ट्र। उन सभ्यताओं के विपरीत जो अस्तित्वहीन हो गई हैं या अपनी पहचान खो चुकी हैं, भारत दुनिया में एकमात्र जीवित सभ्यता है। सदियों के विदेशी आक्रमणों, औपनिवेशिक शासन और सांस्कृतिक आक्रमण के बावजूद, इसने अपनी सभ्यता की निरंतरता को बनाए रखा है। यह संयोग नहीं है, बल्कि इस भूमि की आत्मा को बनाए रखने वाले गहरे सांस्कृतिक मूल्यों के कारण है।
 
संघ का दर्शन इस सांस्कृतिक आधार पर मजबूती से खड़ा है। यह हिंदुत्व को एक संकीर्ण धार्मिक पहचान के रूप में नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत लोकाचार के रूप में देखता है, जो व्यक्तिगत व्यवहार, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय अखंडता का मार्गदर्शन करता है। यह वह भावना है जो ज्ञान का सम्मान करती है, करुणा का पोषण करती है, विविधता का सम्मान करती है और एकरूपता के बिना एकता चाहती है।
 
हमारे सांस्कृतिक मूल्य हमें सिखाते हैं कि दुनिया एक परिवार है — वसुधैव कुटुम्बकम। इस वैश्विक दृष्टिकोण में सह-अस्तित्व एक मजबूरी नहीं है, बल्कि एक उत्सव है। संघ सार्वजनिक जीवन, शिक्षा और सामाजिक आचरण में इस दृष्टिकोण को पुनर्जीवित और मजबूत करना चाहता है।
 
शाखाओं, सेवा गतिविधियों और बौद्धिक जुड़ाव के माध्यम से संघ इस शाश्वत ज्ञान में निहित जीवन शैली को बढ़ावा देता है। इसका लक्ष्य भारत को फिर से वैभवसंपन्न बनाना है — पश्चिम की नकल करके नहीं, बल्कि अपनी आत्मा को फिर से खोजकर, अपनी संस्कृति को पुनर्जीवित करके और आत्मविश्वास और करुणा के साथ दुनिया में योगदान देकर। यह केवल एक दर्शन नहीं है, यह एक जीवंत मार्ग है। यह हिंदुत्व है — शाश्वत, समावेशी और गहराई से मानवीय।