भारत के जनजातीय समुदायों ने सदियों से भारतीय सभ्यता और मूल्यों को सुरक्षित रखा है। अपनी गहरी सांस्कृतिक महत्ता के बावजूद उन्हें लंबे समय तक सामाजिक उपेक्षा, गरीबी और बाह्य ताकतों द्वारा लक्षित धार्मिक परिवर्तनों का सामना करना पड़ा। इस स्थिति का समाधान करने के लिए संघ के दूसरे सरसंघचालक श्री गुरुजी ने जनजाति उत्थान हेतु एक समर्पित प्रयास की कल्पना की। इसी क्रम में, 1952 में रमाकांत केशव देशपांडे (बालासाहेब देशपांडे) ने छत्तीसगढ़ के जशपुर में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की, जो उस समय ईसाई मिशनरी गतिविधियों से गहराई से प्रभावित क्षेत्र था।
सिर्फ 13 जनजातीय बच्चों के लिए शुरू किए गए एक छोटे से विद्यालय ने आगे चलकर एक देशव्यापी आंदोलन का रूप ले लिया। 1978 के बाद से आश्रम ने जनजातीय क्षेत्रों वाले राज्यों में व्यापक विस्तार किया और शिक्षा, स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता तथा सांस्कृतिक संवर्धन जैसे क्षेत्रों में यह निरंतर कार्य कर रहा है। इसका उद्देश्य जनजातीय और मुख्यधारा के समाज के बीच की दूरी को कम करना है। साथ ही उनकी विशिष्ट परंपराओं और पहचान का सम्मान बनाए रखना भी है।
कल्याण आश्रम का मूल उद्देश्य सेवा के माध्यम से भारत की हिंदू सांस्कृतिक चेतना को सशक्त बनाना है किसी प्रकार के धर्मांतरण से नहीं। यह जनजातीय समाज में उनके अपने धर्म, परंपरा और पहचान के प्रति आत्मविश्वास और अपनत्व को मजबूत करता है। भारत के वन, पर्वतीय और सीमावर्ती क्षेत्रों में फैली 705 जनजातियाँ, जो देश की कुल जनसंख्या का 8.6% हैं, हमारी सभ्यता, आध्यात्मिकता और भौगोलिक एकता की महत्वपूर्ण आधारशिला हैं। ऐसे में वनवासी कल्याण आश्रम भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अखंडता को संरक्षण देने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।