स्वयंसेवक कौन है?
स्वयंसेवक होना एक 'मनःस्थिति' है जो उसके द्वारा पहने जाने वाले गणवेश या उसके द्वारा किए जाने वाले शारीरिक अभ्यास से परिभाषित नहीं होती। उसकी पहचान भारत से जुड़ी उस धड़कन से होती है, जो उसके सीने में गूंजती रहती है। वह एक साधारण व्यक्ति है, परंतु असाधारण उद्देश्य के साथ न केवल अपने लिए, बल्कि समाज, धर्म और मातृभूमि के लिए जीने वाला व्यक्ति है। बाहरी दुनिया की दृष्टि में वह एक छात्र, एक कोडर, एक कलाकार, एक किसान या एक उद्यमी हो सकता है, किंतु भीतर से वह एक शांत योद्धा है, जो दैनिक अनुशासन के माध्यम से अपने जीवन को गढ़ता है और शारीरिक रूप से स्वस्थ, मानसिक रूप से सजग, भावनात्मक रूप से संतुलित तथा आध्यात्मिक रूप से गहरे जुड़े रहने का प्रयत्न करता है। वह केवल सपनों का पीछा करने के लिए नहीं, बल्कि सेवा करने के लिए हर सुबह जगता है।
वह जानता है कि असली शक्ति विद्रोह में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी में निहित है। स्वयंसेवक के लिए शाखा मात्र एक उद्यान गतिविधि नहीं, बल्कि व्यक्तित्व की संपूर्ण मूर्तिकला है, जहाँ शरीर, भावनाएँ, बुद्धि और आत्मा का प्रशिक्षण होता है। यहीं खेलों की ऊर्जा, कहानियों की प्रेरणा और सामूहिक प्रार्थना की गंभीरता के बीच वह सीखता है कि एकता ही शक्ति है, विनम्रता ही साहस है और धर्म ही मार्गदर्शक तारा है। शाखा में वह दूसरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होता है, जहाँ जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र की दीवारें स्वतः विलीन हो जाती हैं। शेष बचती है अपने सबसे शुद्ध और उज्ज्वल रूप में केवल भारत की आत्मा।
स्वयंसेवक परिवर्तन का नेतृत्व करने के लिए दूसरों की प्रतीक्षा नहीं करता। वह स्वयं ही वह परिवर्तन बन जाता है। चाहे आपदा के समय सहायता पहुँचाना हो, झुग्गियों के बच्चों को शिक्षा देना हो, जल संरक्षण करना हो या उपेक्षित गाँवों में ज्ञान के मंदिर खड़े करना हो। वह वहीं कदम बढ़ाता है, जहाँ औरों को संकोच होता है और ऐसा करते हुए मुस्कुराता है। उसका विश्वास है कि सच्चा परिवर्तन आत्म-परिवर्तन से आरंभ होता है, नारे से नहीं। सेवा ही आगे बढ़ने का वास्तविक मार्ग है। स्वयंसेवक अपने जीवन से एक गहन संदेश देते हैं कि आप जड़ों से जुड़े रहते हुए भी प्रगतिशील हो सकते हैं। आप अपनी विरासत से प्रेम कर सकते हैं बिना किसी से घृणा किए। आप आधुनिक बन सकते हैं अपनी आत्मा को खोए बिना। आप स्वतंत्र रह सकते हैं, फिर भी पूर्णतः समर्पित।
एक स्वयंसेवक संघ प्रार्थना के शब्दों को अपने जीवन में साकार करता है।
“नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे”
स्वयंसेवक मातृभूमि को खोखले अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि अपने कर्म, विचार और बलिदान से प्रणाम करता है। वह जानता है कि जीवन का असली पैमाना पसंद या अनुयायी नहीं, बल्कि वे जीवन हैं जिन्हें छुआ गया है, वे मूल्य हैं जिन्हें जिया गया है और वह राष्ट्र है, जिसका उत्थान हुआ है। स्वयंसेवक न तो घृणा की उपज है, न ही भय की। वह प्रेम की संतान है, धर्म की संतान है और भारत माता की संतान है। इसी कारण वह उसी मार्ग पर चलता है। यही मार्ग उसका धर्म है, यही मार्ग उसका जीवन है।