राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी विशिष्ट नेतृत्व शैली के कारण सदैव अलग पहचान रखता है। यह नेतृत्व व्यक्तिगत करिश्मे या आदेश-प्रभाव पर नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता, चरित्र, त्याग और स्पष्ट चिंतन पर आधारित है। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार की जीवनी लिखने वाले संघ प्रचारक नाना पालकर ने एक बार स्पष्ट कहा था, “डॉ. हेडगेवार मात्र एक नेता नहीं थे; वे एक शक्ति थे, जो भीतर से नेतृत्व करते थे।” उनका नेतृत्व नियंत्रण पर नहीं, बल्कि प्रत्येक स्वयंसेवक के भीतर आत्मविश्वास और आंतरिक आस्था को जगाने की क्षमता पर आधारित था।
संघ का नेतृत्व आरंभ से ही साधारण स्वयंसेवकों के बीच से स्वाभाविक रूप से उभरा है। इसमें न तो कोई विशेष अभिजात वर्ग है और न ही कोई बाह्य परिष्करण या विशेष प्रशिक्षण।
एक स्वयंसेवक की यात्रा एक सामान्य सदस्य के रूप में आरंभ होती है — खेलों में भाग लेकर, अनुशासन सीखकर, भारत माता के सार को समझकर और निःस्वार्थ सेवा का अभ्यास करके। किंतु जो बात इन 'साधारण' व्यक्तियों को जोड़ती है, वह है उनकी 'सामान्य सोच'— सांस्कृतिक जागरण के माध्यम से राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की साझा दृष्टि।
स्वयंसेवकों का निर्माण एक आजीवन प्रक्रिया है। यह बाह्य चमक-दमक नहीं, बल्कि आंतरिक परिष्कार का मार्ग है। स्वयंसेवक दूसरों के लिए जीना सीखता है और समाज कल्याण हेतु व्यक्तिगत स्वार्थ का त्याग करता है। दैनिक शाखा, सेवा और सतत् संपर्क के माध्यम से वह वे मूल्य आत्मसात करता है, जो उसे हर परिस्थिति में, जहाँ भी आवश्यकता हो, नेतृत्व के लिए तैयार करते हैं।
संघ में नेतृत्व माँगा नहीं जाता; यह परिस्थितियों और साथियों की स्वीकृति से स्वाभाविक रूप से उभरता है।
संघ का प्रत्येक नेता विनम्रता, संकल्प, धैर्य और दूरदृष्टि का अद्वितीय संगम होता है। वह स्वयं को संगठन से ऊपर नहीं रखता, बल्कि बड़े लक्ष्य में पूर्णतः एकाकार हो जाता है। डॉ. हेडगेवार, श्री गुरूजी, बालासाहेब देवरस या समकालीन नेतृत्व सभी एक ही मूलभूत अनुशासन से उभरे, किंतु प्रत्येक ने संगठन के शाश्वत सिद्धांतों पर अडिग रहकर संघ के विकास में अपना विशिष्ट योगदान दिया।
यही सिद्धांत जमीनी स्तर पर अनुभव किया गया है और यहीं से नेतृत्व स्वाभाविक रूप से उभरता है।
संघ का नेतृत्व मॉडल एक शांत, किंतु शक्तिशाली विकल्प के रूप में खड़ा है, जो असाधारण दृष्टि से गढ़े गए साधारण व्यक्तियों की शक्ति पर विश्वास करता है। यह सेवा का नेतृत्व है, पद की स्थिति का नहीं। यही कारण है कि इसकी गूंज पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई देती है। इसी दृष्टिकोण के कारण समान क्षमताओं वाला व्यक्ति, स्वयंसेवक बनकर असाधारण कार्य करते हुए दिखाई देता है।