स्वतन्त्रता आंदोलन और विभाजन
संघ और स्वतन्त्रता आंदोलन
संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार बचपन से ही ब्रिटिश शासन के विरोधी थे। वे क्रांतिकारियों और अनुशीलन समिति से घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे तथा बम बनाने का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। 1905 में बंगाल विभाजन के बाद वे सक्रिय रूप से स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित हुए। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्हें मध्य प्रांत में क्रांतिकारी गतिविधियों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उस समय 1857 की भांति ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष आयोजित करने की योजना बनाई गई थी। डॉ. हेडगेवार कांग्रेस में भी सक्रिय रहे और संघ की स्थापना के बाद भी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेते रहे। विशेष रूप से, संघ की प्रतिज्ञा में ‘हिंदू राष्ट्र की स्वतंत्रता’ का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यहाँ तक कि पुलिस द्वारा तैयार गुप्त रिपोर्टों में संघ को एक खतरनाक संगठन बताया गया।
26 जनवरी, 1930 को कांग्रेस के पूर्ण स्वतंत्रता के प्रस्ताव के समर्थन में संघ की सभी शाखाओं में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी अनेक स्वयंसेवक सक्रिय रूप से सम्मिलित हुए और उनमें से कई को जेल जाना पड़ा। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अनेक कांग्रेस और क्रांतिकारी नेताओं को संघ स्वयंसेवकों ने शरण और सहयोग प्रदान किया। संघ की भूमिका केवल भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रही। स्वतंत्रता के बाद भी जब गोवा, दादरा और नगर हवेली पर पुर्तगालियों का कब्ज़ा बना रहा, तब उनकी मुक्ति के आंदोलनों में भी संघ के कार्यकर्ताओं ने उल्लेखनीय योगदान दिया।
संघ और विभाजन
संघ ने देश के विभाजन का प्रबल विरोध किया। जून 1947 में जब कांग्रेस ने अप्रत्याशित रूप से विभाजन का समर्थन किया, तो संघ ने इसके विरुद्ध व्यापक जागृति अभियान चलाया। इसके अंतर्गत संगठन के सभी पदाधिकारी देशभर में प्रवास पर निकले।
तत्कालीन सरसंघचालक श्री एम. एस. गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने स्वयं लाहौर, कराची, जालंधर और अमृतसर का प्रवास किया। इन यात्राओं में संघ नेतृत्व ने हिंदू समाज से भेंटकर विभिन्न परिस्थितियों में उनका मनोबल बढ़ाने का प्रयास किया। साथ ही, उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात कर हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया।
हिंदुओं की रक्षा और किसी भी हमले का सामना करने के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। ऐसे लगभग 300 कार्यक्रम हुए, जिनमें केवल लाहौर में ही 80 कार्यक्रम संपन्न किए गए। इसके साथ ही संघ कार्यकर्ता चिकित्सा सहायता और आवश्यक भोजन की आपूर्ति जैसी सेवाओं में भी सक्रिय रूप से लगे रहे। स्वयंसेवकों को निर्देश दिया गया था कि वे अपने-अपने गाँवों, कस्बों और शहरों में रहकर हिंदुओं की रक्षा सुनिश्चित करें। इस संघर्षपूर्ण काल में संघ के लगभग 1000 स्वयंसेवकों ने अपने प्राण न्योछावर किए। फिर भी कार्य रुकने नहीं दिया गया। विभाजन के दौरान संघ कार्यकर्ताओं ने हिंदू रक्षा समिति, पंजाब राहत समिति और वास्तुहारा सहायता समिति जैसे विभिन्न मंचों के अंतर्गत कार्य किया। साथ ही, विभिन्न स्थानों पर आयोजित राहत शिविरों के माध्यम से लगभग 50,000 शरणार्थियों के लिए भोजन, वस्त्र, दवाइयाँ और अन्य आवश्यक सामग्री की व्यवस्था की गई।