संघ सृष्टि / परिवार?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ    30-Sep-2026
Total Views |
 
डॉ. हेडगेवार का मानना था कि राष्ट्रीय कार्यों के लिए पर्याप्त संख्या में गुणवान और प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता है। संघ की शाखाएँ इस लक्ष्य हेतु व्यक्ति निर्माण की प्रयोगशालाएँ बन गईं। उनका कहना था कि "संघ का अर्थ है शाखा और शाखा का अर्थ है व्यक्तित्व विकास का कार्यक्रम"।
 
व्यक्ति-परिवर्तन से सामाजिक-परिवर्तन और व्यवस्था-परिवर्तन की यात्रा
 
देशभक्ति की गहरी भावना से प्रेरित और राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाने के लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता राष्ट्रीय जीवन के विविध क्षेत्रों में सक्रिय दिखाई देते हैं। वे सभी एक ही विचारधारा से प्रेरित होते हैं, जो आपसी भावनात्मक बंधन और भाईचारे की भावना का निर्माण करती है। समान पथ पर चलते हुए वे अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उच्च स्तर का समन्वय बनाए रखते हैं।
 
'संघ परिवार' शब्द का प्रयोग मीडिया प्रायः संघ प्रेरित संगठनों के लिए करता है, जबकि वस्तुतः ऐसा कोई औपचारिक संगठन अस्तित्व में नहीं है। इसे 'संघ-सृष्टि' कहना अधिक उपयुक्त है। क्योंकि इन संगठनों के कार्यकर्ता एक जैसी कार्यशैली और कार्य संस्कृति में ढले होते हैं तथा अपने-अपने क्षेत्रों में समान विचारधारा के साथ कार्य करते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनमें परिवार जैसी आत्मीयता और अपनापन विकसित होता है।
 
संघ से प्रेरित सभी संगठन अपने-अपने क्षेत्रों में पूर्ण स्वायत्तता के साथ कार्य करते हैं। उनके अपने संविधान, पद, पदाधिकारी और कार्यपद्धति होती है। वे अपने-अपने क्षेत्रीय हितों के अनुरूप कार्य करते हैं, किंतु उनकी मौलिक वैचारिक आधारभूमि समान रहती है। स्वतंत्रता इतनी है कि कभी-कभी उनके कार्य आपस में विरोधाभासी प्रतीत होते हैं, फिर भी साझा वैचारिक आधार उन्हें अंतिम उद्देश्य से विचलित नहीं होने देता।
 
ऐसे संगठनों की स्थापना और विकास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की निरंतर प्रगति का संकेतक है। लाखों लोगों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देशभक्ति के विचारों के प्रति अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता स्थापित की है। 1936 में वंदनीया लक्ष्मीबाई केलकर द्वारा राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना की गई, जो विशेष रूप से महिलाओं के लिए एक संगठन है।
 
संघ का दृष्टिकोण सदैव यह रहा है कि ऊर्जा उत्पन्न की जाए और उसे कार्यकर्ताओं के माध्यम से सुव्यवस्थित ढंग से समाज में वितरित किया जाए। इसी आस्था को आधार बनाकर राष्ट्रीय जीवन के विविध क्षेत्रों में कार्यरत संगठनों की आवश्यकता को सबसे पहले दूसरे सरसंघचालक श्री गुरुजी ने रेखांकित किया। विभाजन और स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि में जुलाई 1947 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रधर्म प्रकाशन की स्थापना की।
 
स्वतंत्रता के दो वर्ष बाद श्री गुरुजी ने छात्रों के लिए एक विशेष संगठन बनाने का सुझाव दिया। परिणामस्वरूप 9 जुलाई, 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना हुई, जो आज सदस्यता और भौगोलिक विस्तार के आधार पर देश का सबसे बड़ा छात्र संगठन है। उसी वर्ष मीडिया क्षेत्र में योगदान के लिए 'हिंदुस्थान समाचार' की स्थापना की गई।
 
उन्नीस सौ पचास के दशक में संघ से प्रेरित कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में संगठनों की एक श्रृंखला खड़ी की। इनमें प्रमुख हैं — भारतीय जनसंघ (1951 में निर्मित, जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी बना), भारतीय मजदूर संघ (1955), वनवासी कल्याण आश्रम (1952) और विद्या भारती (1952)। राजनीति, छात्र, श्रम, शिक्षा और आदिवासी ये वे क्षेत्र थे, जिन्हें संघ ने अपने विस्तार और प्रभाव के लिए चुना।
 
धीरे-धीरे अनेक संगठनों के गठन के साथ संघ ने अपनी परिधि का विस्तार किया और राष्ट्रीय जीवन में देशभक्ति की विचारधारा को नया बल प्रदान किया।
 
इन संगठनों में प्रमुख रूप से भारत विकास परिषद, विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय साहित्य परिषद, भारतीय शिक्षण मंडल, दीनदयाल शोध संस्थान, अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत, भारतीय किसान संघ, सहकार भारती, संस्कार भारती, प्रज्ञा प्रवाह, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, विश्व विभाग, सामाजिक समरसता मंच, स्वदेशी जागरण मंच, संस्कृत भारती, आरोग्य भारती, सेवा भारती, राष्ट्रीय सेवा भारती, नेशनल मेडिकोज ऑर्गनाइजेशन, भारतीय इतिहास संकलन समिति, अखिल भारतीय शैक्षिक महासंघ, पूर्व सैनिक सेवा परिषद और हिंदू जागरण मंच शामिल हैं।
 
वर्तमान में ऐसे लगभग 32 संगठन विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं, जिनका साझा लक्ष्य राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाना है।
सूची पर एक नज़र डालते ही स्पष्ट हो जाता है कि संघ-प्रेरित शिक्षा से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और उद्योग हर क्षेत्र में संघ-प्रेरित संगठन सक्रिय हैं।
 
32 संगठन एक समान विचारधारा और समाज-सेवा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता से जुड़े हुए हैं तथा परस्पर समन्वय के साथ कार्य करते हैं। उनके निरंतर प्रयासों का परिणाम है कि देश में एक नई जागृति का संचार हुआ है, जो 'स्व' पर आधारित है।