प्रार्थना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ    30-Sep-2026
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'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे'... संघ स्वयंसेवकों के लिए प्रार्थना सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत है। यह उन्हें उनके परम लक्ष्य को स्मरण कराती है और इस सत्य को पुष्ट करती है कि यह राष्ट्र एक हिंदू राष्ट्र है। तमाम बाधाओं और चुनौतियों के बावजूद यह स्वयंसेवकों की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करती है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह उन्हें निरंतर याद कराती है कि उन्होंने इस उद्देश्य के लिए पूरी निष्ठा और स्वेच्छा से स्वयं को समर्पित किया है।
 
प्रार्थना की शक्ति ऐसी है कि शायद ही कोई स्वयंसेवक होगा जो सामूहिक रूप से गाई जाने वाली संघ प्रार्थना सुनकर रोमांचित, उत्साहित, उदात्त और प्रेरित न हो।
 
वर्तमान संस्कृत प्रार्थना में केवल एक पंक्ति हिंदी में है — भारत माता की जय! संघ ने सामूहिक रूप से प्रार्थना गाने की परंपरा को निरंतर बनाए रखा है और आज यह एक मानक के रूप में स्थापित हो चुकी है। संघ प्रार्थना पहली बार 18 मई, 1940 को पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में तत्कालीन प्रचारक श्री यादव राव जोशी द्वारा सार्वजनिक रूप से गाई गई थी।
 
आरंभ में संघ प्रार्थना मराठी और हिंदी में थी, किंतु जैसे-जैसे संघ का विस्तार देश के विभिन्न हिस्सों तक हुआ, एक सर्वमान्य और उपयुक्त प्रार्थना की आवश्यकता अनुभव की गई।
 
फरवरी 1939 में सिंदी में आयोजित एक बैठक में संघ प्रार्थना संस्कृत में करने का निर्णय लिया गया। यह प्रार्थना पुणे स्थित संस्कृत शिक्षक श्री नरहरि नारायण भिडे द्वारा संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और श्री एम. एस. गोलवलकर (गुरुजी) के मार्गदर्शन में रची गई थी। 1913 में नागपुर में जन्मे श्री भिडे पारिवारिक कारणों से पुणे चले गए, जहाँ उन्होंने डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी के न्यू इंग्लिश स्कूल में संस्कृत शिक्षक के रूप में कार्य किया। डॉ. हेडगेवार, संस्कृत भाषा के प्रति श्री भिडे के गहन जुनून से भली-भाँति परिचित थे। इसी कारण उन्होंने 1939 में उन्हें संघ के लिए संस्कृत प्रार्थना लिखने का दायित्व सौंपा।
तब से यह प्रार्थना सभी स्वयंसेवकों के लिए निरंतर प्रेरणा का एक महान स्रोत बनी हुई है।
 
प्रत्येक शाखा का समापन प्रार्थना से होता है। यह प्रार्थना स्वयंसेवकों की मानसिक तैयारी में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है और उन्हें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों की याद दिलाती है। यह प्रार्थना स्वयंसेवकों को संघ के उद्देश्य, उसके लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग और इसके लिए आवश्यक गुणों का सतत स्मरण कराती है।
 
 
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयं शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं सुशीलं जगद् येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत कण्टकाकीर्णमार्गं स्वयं स्वीकृतं नः सुगंकारयेत् ।।२।।
समुत्कर्ष निःश्रेयसस्यैकमुग्रं परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।
।। भारत माता की जय ।।