प्रज्ञा प्रवाह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ    30-Sep-2026
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प्रज्ञा प्रवाह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बौद्धिक शाखा है, जो भारत की समृद्ध सभ्यतागत विरासत के पुनर्जीवन और संवर्धन हेतु प्रतिबद्ध है। श्री बालासाहेब देवरस, श्री के. एस. सुदर्शन और श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी के मार्गदर्शन में 1980 के दशक की शुरुआत में इसकी परिकल्पना की गई थी। इसे औपचारिक रूप से 1987 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में आरंभ किया गया ताकि मौजूदा सांस्कृतिक प्रयासों का समन्वय किया जा सके और भारतीय ज्ञान-परंपराओं को कमज़ोर करने वाले यूरोप-केंद्रित आख्यानों को चुनौती दी जा सके।
  
वर्तमान में इसके राष्ट्रीय संयोजक श्री जे. नंदकुमार हैं। उनके मार्गदर्शन में प्रज्ञा प्रवाह भारतीय ज्ञान-परंपराओं से जुड़े विद्वानों, शिक्षाविदों और संस्थानों का एक अखिल भारतीय नेटवर्क खड़ा कर रहा है। इसका उद्देश्य वैदिक दर्शन, शास्त्रीय कलाओं, धार्मिक परंपराओं, संस्कृत और स्वदेशी विज्ञानों को समाहित करते हुए भारतीय दृष्टिकोण से शैक्षणिक और सार्वजनिक विमर्श को प्रेरित करना है।
 
इसके द्वारा आरंभ मुख्य प्रयासों में शामिल हैं बुद्धिजीवियों और कलाकारों का राष्ट्रीय सम्मेलन 'लोकमंथन' तथा 'ज्ञान संगम'। इन प्रयासों के माध्यम से प्राचीन ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर नवाचार और सृजनशीलता को प्रोत्साहित किया जाता है।
इसी प्रकार नियमित संकाय विकास कार्यक्रमों, छात्र शिविरों और सम्मेलनों के माध्यम से शिक्षकों व शोधकर्ताओं को औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करके उन्हें भारतीय ज्ञानमीमांसा को गहराई देने के लिए सशक्त बनाया जाता है। प्रकाशनों, डिजिटल सामग्री और जनसंपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से प्रज्ञा प्रवाह आज भारत के सांस्कृतिक जागरण की एक महत्वपूर्ण शक्ति है, जो परंपरा और आधुनिकता को जोड़ते हुए एक ऐसे आत्मविश्वासी और सभ्यतागत रूप से निहित समाज का निर्माण कर रही है, जो वैश्विक मंच पर अपनी पहचान दर्ज कराने के लिए तत्पर है।