एषः पन्थाः

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ    30-Sep-2026
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एक ऐसा भारत, जो प्रभुत्व के लिए नहीं, बल्कि अपने नैतिक और सांस्कृतिक प्रभाव से विश्वगुरु के रूप में जगमगाए। एक ऐसा भारत, जहाँ हर नागरिक एकता, गर्व और उद्देश्य का अनुभव करे। संघ का विश्वास है कि जब समाज की संगठित शक्ति धर्म की रक्षा करती है तो राष्ट्र स्वाभाविक रूप से अपनी सर्वोच्च क्षमता तक पहुँचता है। जब स्वयंसेवक अंतिम व्यक्ति तक पहुँचकर उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं, तब धर्म जीवित रहता है। जब धर्म जीवित रहता है, तो भारत हर दृष्टि से समृद्ध होता है।
इस यात्रा का कोई शॉर्टकट नहीं है। इसमें पीढ़ियों तक धैर्य की आवश्यकता होती है। इसकी शुरुआत हमेशा एक व्यक्ति से होती है। हर दिन, अनुशासन और भक्ति के साथ। एक ऐसे सपने के साथ, जिसमें बसता है पुनरुत्थानशील और उज्ज्वल भारत।
 
हमारा साधन:
 
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
 
हर दिन प्रात:काल हजारों खुले मैदानों और शांत उद्यानों में शाखा के रूप में एक सरल, किंतु अत्यंत शक्तिशाली दृश्य प्रकट होता है। यहीं पर स्वयंसेवक को गढ़ा और संस्कारित किया जाता है। खेलों, सामूहिक प्रार्थना, विचार-मंथन और अनुशासन के माध्यम से शाखा एक चरित्र-निर्माण की प्रयोगशाला बन जाती है। यही हमारा साधन है, जिससे नि:स्वार्थ व्यक्तियों का निर्माण होता है।
हमारी संयुक्त शक्ति हर श्रेष्ठ कार्य में विजयी हो।
 
स्वयंसेवक को आदेश चलाने के लिए नहीं, बल्कि सेवा करने के लिए तैयार किया जाता है। विरोध करने के लिए नहीं, बल्कि समाज को जगाने के लिए तैयार किया जाता है। श्रेय लेने के लिए नहीं, बल्कि बलिदान देने के लिए तैयार किया जाता है।
 
हमारा ध्येय है
 
"विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्। "
 
धर्म की रक्षा ही हमारा आगे बढ़ने का मार्ग है। धर्म केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि न्याय, करुणा और आत्मसंयम की शाश्वत धारा है, जो व्यक्ति को समाज से और समाज को संपूर्ण ब्रह्मांड से जोड़ती है। संघ भारत को मात्र एक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता के रूप में देखता है। इस सभ्यता के पुनरुत्थान का पथ प्रतिदिन धर्म को आचरण में उतारने में निहित है— विचार में सत्य, कर्म में विनम्रता और उद्देश्य में एकता के साथ। यही हमारी साधना है—जीवन का अनुशासित पथ, जो केवल विश्वास नहीं बल्कि व्यवहार है।
 
यही हमारा ध्येय है। यही हमारा साधन है। यही हमारा पथ है।"
 
एषः पन्थाः।