छठे सरसंघचालक (2009-वर्तमान)
शाश्वत भारत के दूरदर्शी नेता। परंपरा और आधुनिकता के मध्य एक सेतु।
वर्ष 1950 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर में जन्मे श्री मोहन मधुकर भागवत वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छठे सरसंघचालक हैं। एक स्वयंसेवक परिवार में पले-बढ़े श्री भागवत ने बाल्यकाल से ही सेवा और राष्ट्रनिर्माण के संघ संस्कारों को आत्मसात किया। सत्तर के दशक में पशु चिकित्सा की शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक का जीवन स्वीकार किया। यह उनके जीवन का एक निर्णायक निर्णय था, जिसने उनके जीवन-ध्येय और राष्ट्रसेवा की दिशा को स्पष्ट आकार प्रदान किया।
शारीरिक शिक्षण प्रमुख से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक की यात्रा तय करते हुए मोहन जी अपने व्यावहारिक दृष्टिकोण, समावेशी चिंतन और भविष्य-उन्मुख नेतृत्व के लिए प्रसिद्ध रहे हैं।
आज के युवाओं के लिए उनका संदेश :
- हिंदुत्व को केवल एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और सर्वसमावेशी शक्ति के रूप में आत्मसात करें।
- जातिगत भेदभाव का दृढ़तापूर्वक विरोध करें और सामाजिक समरसता को बढ़ावा दें।
- आधुनिक चिंतन और भारतीय सभ्यता के शाश्वत ज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करें।
- वैश्विक चुनौतियों का सामना आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के साथ करें।
मोहनजी ऐसे भारत की परिकल्पना करते हैं, जहाँ प्राचीन जीवन-मूल्य और आधुनिक आकांक्षाएँ साथ-साथ अग्रसर हों। ऐसा भारत, जो धर्म अर्थात् मानवीय मूल्यों के आधार पर विश्वगुरु के रूप में संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करे। भारत के युवाओं के लिए उनका संदेश सरल, किंतु अत्यंत प्रेरणादायी है:
जड़ों से जुड़े रहें, प्रगति करें और निडर बनें।
यही हमारा मार्ग है। एष: पंथा:।