मधुकर दत्तात्रेय देवरस (बालासाहेब देवरस)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ    30-Sep-2026
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तीसरे सरसंघचालक (1915-1996)
 
सहनशीलता के प्रतीक मार्गदर्शक, सेवा के पुरोधा।
 
वर्ष 1915 में नागपुर में जन्में बालासाहेब देवरस बाल्यकाल से ही संघ की ओर आकृष्ट हुए और समर्पण की अटूट भावना के साथ आगे बढ़े। संस्कृत, दर्शन और कानून में डिग्री के साथ उन्होंने व्यावहारिक नेतृत्व को बौद्धिक गहराई से जोड़ा।
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीसरे सरसंघचालक के रूप में उन्होंने स्वतंत्र भारत की कठिनतम परिस्थितयों में संघ का नेतृत्व किया — विशेषकर 1975 में लागू आपातकाल के समय जब संघ पर प्रतिबंध लगाया गया और हजारों स्वयंसेवकों को बिना किसी कारण जेल में डाल दिया गया। उनके मार्गदर्शन में संघ ने ऐसे ऐतिहासिक सत्याग्रह का नेतृत्व किया, जिसने लोकतंत्र और राष्ट्रीय स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दृढ़तापूर्वक संघर्ष किया। बालासाहेब ने सेवा को देशभक्ति की सबसे मौलिक और प्रामाणिक अभिव्यक्ति मानते हुए उस पर विशेष बल दिया।
 
उनके कार्यकाल में संघ ने अपने सामाजिक दायरे को विस्तार देते हुए जनजातीय समुदायों, पूर्वोत्तर भारत और वंचित वर्गों तक पहुँच बनाई। उन्होंने आदर्शों को वास्तविक धरातल पर प्रत्यक्ष आचरण में उतारा। 1974 में पुणे की वसंत व्याख्यानमाला में दिया गया उनका भाषण ऐतिहासिक दृष्टि से मील का पत्थर माना जाता है। उस व्याख्यानमाला में उन्होंने सामाजिक समानता पर अत्यंत दृढ़ता और स्पष्टता के साथ जोर दिया था।
 
उनका विश्वास था कि राष्ट्र-निर्माण आजीवन निभाई जाने वाली प्रतिबद्धता है। उन्होंने स्वयंसेवकों को समाज में सकारात्मक परिवर्तन के सशक्त प्रतिनिधि बनने के लिए प्रेरित किया। उनका जीवन आज के युवाओं के लिए एक सशक्त संदेश है—साहस के साथ नेतृत्व करो, विनम्रता के साथ सेवा करो और राष्ट्र के प्रति अडिग बने रहो। यही हमारा मार्ग है। एषः पंथा:।