पाँचवे सरसंघचालक (1931-2012)
एक करुणामय मार्गदर्शक। एक निडर सुधारक। स्वदेशी भाव के प्रणेता।
के. एस. सुदर्शन जी का जन्म 1931 में छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआ था। वे संघ के पांचवें सरसंघचालक बने। सुदर्शन जी ने गहरी भावनात्मक समझ और दूरदर्शी नेतृत्व का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। अपने सरल स्वभाव, आत्मीयता और मिलनसार व्यवहार के लिए वे जाने जाते थे। सुदर्शन जी ने हमेशा स्वयंसेवकों को करुणा, सादगी और सेवा के मूल्यों को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा दी।
उनका विश्वास था कि वास्तविक राष्ट्रीय पुनर्जागरण की शुरुआत स्वदेशी अर्थनीति, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता के पुनरुद्धार से ही होनी चाहिए। उन्होंने-
- स्वदेशी उद्योगों और सतत विकास की वकालत की
- सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध अभियान चलाया, और
- विभिन्न समुदायों में संवाद और एकता को बढ़ावा दिया।
संघ के एक वैश्विक नेता होने के बावजूद वे आश्चर्यजनक रूप से सहज और सुलभ बने रहे तथा बिना किसी भय या पूर्वाग्रह के संवाद, बहस और असहमति का स्वागत करते रहे।
उनकी नेतृत्व शैली प्रेम और अनुनय से प्रेरित थी।
सुदर्शन जी एक कवि हृदय, वैज्ञानिक चिंतक और कर्म की दृष्टि से सच्चे देशभक्त थे। उन्होंने ऐसे भारत का स्वप्न देखा, जो अपनी आध्यात्मिक शक्ति, सांस्कृतिक ज्ञान और सामाजिक उत्तरदायित्व के बल पर समस्त विश्व का मार्गदर्शन करे।
उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व सेवा है। एकता हर प्रकार के विभाजन से ऊपर है और भारत का भविष्य आत्मनिर्भरता तथा सद्भाव में ही सुरक्षित है।
यही हमारा मार्ग है–एष: पंथा:।