राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की असली शक्ति उसकी दिखने वाली गतिविधियों या आयोजनों में नहीं, बल्कि उसकी जमीनी संरचना अर्थात 'शाखा' में निहित है। शाखा कुछ लोगों की प्रतिदिन दिखने वाली प्रत्यक्ष उपस्थिति भर नहीं है, बल्कि वह मूलभूत इकाई है, जहाँ प्रतिदिन संघ की आत्मा जीवंत होती है। यही वह स्थान है, जहाँ स्वयंसेवक का शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक निर्माण होता है। प्रायः शाखाएँ खुले मैदान में सुबह या शाम, लगभग एक घंटे के लिए आयोजित की जाती हैं।
शाखाओं के साथ-साथ समाज के हर वर्ग तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए बस्ती / मंडल-स्तरीय संरचनाएँ भी हैं। इसके अतिरिक्त साप्ताहिक मिलन या बैठकें उन लोगों के लिए सुविधाजनक होते हैं, जो प्रतिदिन शाखा में उपस्थित नहीं हो पाते। इससे प्रत्येक व्यक्ति को संघ से जुड़े रहने की एक निश्चित पद्धति सुलभ हो जाती है। शाखा का अभिन्न अंग भगवा ध्वज है, जिसे गुरु के रूप में मान्यता प्राप्त है और जो प्रेरणा का शाश्वत प्रतीक है।
शाखा का समापन प्रार्थना के साथ होता है। एक निश्चित स्तर पर स्वयंसेवकों को प्रतिज्ञा दिलाई जाती है, जो नि:स्वार्थ सेवा, अनुशासन और राष्ट्रीय उद्देश्य के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक है। शाखा में खेले जाने वाले खेल मात्र शारीरिक गतिविधियाँ नहीं, बल्कि टीम वर्क, नेतृत्व, सजगता और अनुशासन का भाव विकसित करने के साधन भी हैं। हर खेल और हर अभ्यास स्वयंसेवक के समग्र निर्माण में योगदान देता है। शारीरिक शक्ति के साथ-साथ, शाखा सामूहिक चर्चाओं, कथा-सत्रों और गीतों के माध्यम से बौद्धिक स्पष्टता तथा भावनात्मक दृढ़ता का भी संवर्धन करती है। इनसे देशभक्ति और सांस्कृतिक गौरव की भावना का जागरण भी होता है। शाखा में जो सूक्ष्म, परंतु शक्तिशाली रूप से घटित होता है, वह है ‘मैं’ का विलय और ‘हम’ की भावना का उदय।
स्वयंसेवक स्वयं को एक अलग-थलग व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि साझा जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए व्यापक समाज का अभिन्न अंग मानने लगता है। यह दृष्टि उदारता और सहिष्णुता को पोषित करती है, जो एक सामंजस्यपूर्ण राष्ट्र के निर्माण के लिए अनिवार्य है। प्रत्येक गाँव, नगर और शहर में शाखा उस क्षेत्र का शक्ति-केंद्र बन जाती है। यह शांत रहते हुए भी निरंतर एक ऐसा कार्यकर्ता वर्ग तैयार करता है जो अनुशासित, निस्वार्थ और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़ा होता है। ये केवल स्वयंसेवक नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता हैं। इन्हीं सामान्य और साधारण आधारों से नेता, विचारक और कर्मठ कार्यकर्ता निकलते हैं; जिनका निर्माण शाखा की शांत और दृढ़ शक्ति से होता है। यह परिवर्तन की पाठशाला है। इसे कोई दिखावा नहीं चलाता, बल्कि हमारे भगवा ध्वज, हमारी प्रार्थना और हमारी जीवंत परंपराओं से मिलने वाली निरंतर प्रेरणा इसे आगे बढ़ाती है।