माधव सदाशिवराव गोलवलकर (1906–1973), जिन्हें आदरपूर्वक 'गुरुजी' कहा जाता है, ने द्वितीय सरसंघचालक के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व किया। उन्होंने संघ को आत्म-अनुशासन, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रीय चेतना की अखिल भारतीय शक्ति के रूप में खड़ा किया। उनके नेतृत्व ने कई पीढ़ियों तक संघ की विचारधारा, संगठन और लचीलेपन को आकार दिया। आज भी स्वयंसेवकों द्वारा उन्हें बहुत आदर के साथ स्मरण किया जाता है। 19 फरवरी, 1906 को नागपुर के निकट रामटेक में जन्मे युवा माधव एक सुशिक्षित मराठी परिवार में पले-बढ़े। उनके पिता एक शिक्षक थे, जो बाद में स्कूल के हेडमास्टर भी बने।
उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एमएससी जूलॉजी की डिग्री प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। माधवराव अकादमिक रूप से प्रतिभाशाली थे और साथ ही आध्यात्मिकता और भक्ति की ओर भी आकर्षित थे। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के गुरूभाई स्वामी अखंडानंद से बेलूर मठ में सन्यास की दीक्षा भी ली। 1931 में वे संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से मिले, जिन्होंने उनकी संगठनात्मक क्षमता को पहचाना और उन्हें पूर्णकालिक बनने का सुझाव दिया। शीघ्र ही वे नागपुर में कार्यवाह (सचिव) और बाद में प्रशिक्षण शिविर के प्रमुख भी बने। डॉ. हेडगेवार के आह्वान पर उन्होंने स्वयं को पूरी तरह संघ कार्य के लिए समर्पित करने की दृष्टि से वकालत और मठवासी जीवन दोनों को छोड़ दिया। 1940 में डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद गुरुजी को सरसंघचालक नियुक्त किया गया।
यह नियुक्ति स्वयं डॉ. हेडगेवार ने की थी। अगले 33 वर्षों तक गुरुजी ने पूरे भारत का व्यापक भ्रमण किया, हर क्षेत्र में जाकर संघ के जमीनी ढाँचे को सुदृढ़ किया और नए सहयोगियों को जोड़ा। उनके नेतृत्व में भारतीय जनसंघ और विद्या भारती जैसे संगठनों की स्थापना हुई, जिससे संघ की सामाजिक पहुँच और गहरी हो गई। गुरुजी ने संघ अनुशासन को केवल संगठनात्मक व्यवस्था नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विकास का साधन भी माना। उन्होंने शाखा को चरित्र-निर्माण की 'प्रयोगशाला' बताया और स्पष्ट किया कि वास्तविक नागरिक कर्म आंतरिक संकल्प और सामाजिक समर्पण से ही आरंभ होता है। शाखा की परिवर्तनकारी शक्ति को रेखांकित करते हुए उन्होंने उसे 'सड़न से प्राप्त पेनिसिलिन' बताया--यानी यदि खराब वातावरण को भी सही ढंग से व्यवस्थित किया जाए तो वही वातावरण महानता का स्रोत बन सकता है।
1939 में गुरुजी ने “वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइंड” की रचना की, जिसमें उन्होंने आधुनिक राजनीतिक राष्ट्रवाद से भिन्न एक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में हिंदुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत की असली पहचान मूलतः आध्यात्मिक और सभ्यतागत है, जो साझा मूल्यों और परंपराओं में निहित है। गुरुजी ने साम्यवाद और आंतरिक विखंडन जैसी बाहरी विचारधाराओं के खतरों को स्पष्ट रूप से पहचाना और चेतावनी दी कि भारत की एकता केवल आंतरिक शक्ति, अनुशासन (धर्म) और सांस्कृतिक सामंजस्य से ही सुरक्षित रह सकती है। वे 1966 में स्थापित विश्व हिंदू परिषद के गठन के पीछे एक प्रमुख मार्गदर्शक शक्ति थे। विश्व हिंदू परिषद् के एक सम्मेलन में उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध प्रस्ताव पारित कराना सुनिश्चित किया और समानता एवं सामाजिक समरसता का जोरदार समर्थन किया। गुरुजी के नेतृत्व में संघ ने कई राष्ट्रीय संकटों का धैर्य और संयम से सामना किया। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबंध लगाया गया तो उन्होंने प्रतिबंध हटाने हेतु शांतिपूर्ण सत्याग्रह का आह्वान किया और भारत के संवैधानिक ढाँचे के प्रति पूर्ण निष्ठा का आश्वासन दिया। विभाजन के उपरांत कश्मीर संकट के दौरान गुरुजी स्वयं श्रीनगर पहुँचे और महाराजा हरि सिंह को भारत में विलय के लिए प्रेरित किया। राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने में यह उनका महत्वपूर्ण योगदान है।
स्वतंत्र भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय को लेकर महाराजा हरि सिंह के साथ श्री गुरुजी की वार्ता को निर्णायक पहल माना जाता है। आध्यात्मिक व्यक्तित्व के धनी गोलवलकर गुरुजी अपने गहन दृष्टिकोण के लिए प्रसिद्ध थे, जो उनके छोटे से छोटे कार्यों में भी परिलक्षित होता था। उनके नेतृत्व में संघ केवल एक संगठन नहीं रहा, बल्कि चरित्र, सांस्कृतिक गौरव और आत्म-अनुशासन पर आधारित एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन के रूप में विकसित हुआ। आज 83,000 से अधिक शाखाएँ और अनगिनत सेवा-प्रकल्प उनकी प्रेरणा का परिणाम हैं। श्री गुरुजी का जीवन आज भी हर आयु वर्ग के स्वयंसेवकों के लिए आदर्श है, क्योंकि वह चरित्र में दृढ़, उद्देश्य में स्पष्ट, परंपरा में रचा-बसा और सेवा में निडर था। उनका अटूट विश्वास था कि “आत्म-अनुशासन, शिक्षा और सेवा के माध्यम से व्यक्तिगत परिवर्तन ही समाज के उत्थान का मार्ग है।” यह वाक्य आज उन युवाओं को गहराई से प्रेरित करता है जो एक उद्देश्यपूर्ण जीवन की तलाश में हैं। श्री एम. एस. गोलवलकर ने अपनी प्रखर बुद्धि, गहन करुणा और अटूट अनुशासन के बल पर संघ को आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम एक नैतिक शक्ति के रूप में रूपांतरित किया।
उनका विश्वास था कि धर्म राष्ट्र की रक्षा करता है, सेवा एकता को जन्म देती है और चरित्र सभ्यताओं का निर्माण करता है। अशांति का समय हो या शांति का, गुरुजी अपने इस दृढ़ निश्चय पर सदैव अडिग रहे: “संघ को ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना चाहिए, जो राष्ट्रीय जागरण के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों और महत्वाकांक्षाओं का त्याग करने को तत्पर हों।” आज जब संघ अपने शताब्दी वर्ष से आगे बढ़ चुका है, गुरुजी की दृष्टि हर शाखा और स्वयंसेवक में जीवित है, जो शक्ति, स्पष्टता और विनम्रता के साथ राष्ट्र की सेवा करता है। ‘एषः पन्थाः’ यही वह पथ है, जिसे गुरुजी ने दिखाया। इसी पथ पर पीढ़ी दर पीढ़ी स्वयंसेवक अग्रसर होते जा रहे हैं।