डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल, 1889 को नागपुर में गुड़ी पड़वा के शुभ अवसर पर हुआ था। वे परिवार में सबसे छोटी संतान थे। उनके बड़े भाइयों के नाम महादेव शास्त्री और सीताराम शास्त्री थे। हेडगेवार जी का परिवार मूलतः तेलंगाना से था, परंतु बाद में नागपुर में स्थायी रूप से बस गया था। परिवार आर्थिक रूप से साधारण था, लेकिन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया।
डॉ. हेडगेवार जन्म से ही सच्चे देशभक्त थे, जिसका प्रमाण उनके स्कूल के दिनों में ही दिखाई दे गया था। 1897 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने महारानी एलिजाबेथ के राज्याभिषेक की 60वीं वर्षगांठ मनाने का निर्णय लिया। विद्यालय भवन को सजाया और रोशन किया गया। महारानी के सम्मान में भाषण दिए गए और छात्रों में मिठाइयाँ बाँटी गईं। लेकिन केशव ने वे मिठाइयाँ एक नाले में फेंक दीं, क्योंकि वह विदेशी शासन के किसी भी उत्सव में भाग लेने के सख्त विरुद्ध थे। वे ब्रिटिश शासन के विरोध में उन मिठाइयों को खाना भी उचित नहीं समझते थे और भारत की स्वतंत्रता की कामना करते थे। यह घटना तब की है जब केशव मात्र आठ वर्ष के थे। इसी प्रकार की एक और घटना तब हुई जब वह बारह वर्ष के थे। 1901 में महारानी एलिजाबेथ के निधन के बाद राजा एडवर्ड सप्तम का राज्याभिषेक हुआ। इससे वे भारत के भी शासक बन गए। इस अवसर को मनाने के लिए कुछ संगठनों ने उत्सव आयोजित करने का निर्णय लिया।
नागपुर स्थित एम्प्रेस मिल ने भी राजा एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक के अवसर पर अपने कारखाने को रोशन किया, सजाया और पटाखे फोड़ने का आयोजन किया। स्थानीय लोग इसे एक बड़े उत्सव के रूप में देख रहे थे। किंतु केशव ने अपने मित्रों के बार-बार आग्रह करने के बावजूद उसमें सम्मिलित होने से स्पष्ट इनकार कर दिया। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा कि किसी विदेशी शासक के राज्याभिषेक का उत्सव मनाना भारतीयों के लिए शर्म की बात है। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद केशव ने नीलसिटी हाई स्कूल में प्रवेश लिया। परंतु 1908 में उन्हें "वंदे मातरम्" का नारा लगाने के कारण स्कूल से निष्कासित कर दिया गया। क्योंकि उस समय ब्रिटिश शासन ने इस नारे पर प्रतिबंध लगा रखा था। "वंदे मातरम्" उस दौर में बंगाल विभाजन के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी आक्रोश और आंदोलन का प्रमुख प्रेरक नारा बन चुका था। 1908 में जब निरीक्षक का स्कूल में आगमन हुआ तो छात्रों ने उनका स्वागत "वंदे मातरम्" के नारों से करने का निश्चय किया। इसके परिणामस्वरूप सभी छात्रों को विद्यालय से निकाल दिया गया। इससे अभिभावकों में भी रोष फैल गया। समाधानस्वरूप यह तय किया गया कि प्रत्येक छात्र अपने शिक्षक के सामने गलती स्वीकार करेगा और उसे पुनः प्रवेश मिलेगा। लेकिन केशव ने इस तथाकथित गलती को स्वीकार करने से सख्ती से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप उन्हें विद्यालय से स्थायी रूप से निष्कासित कर दिया गया। उस वर्ष केशव को मैट्रिक की परीक्षा में सम्मिलित होना था, किंतु इस घटना ने उनके लिए गंभीर बाधा उत्पन्न कर दी। बाद में उन्होंने यवतमाल के एक राष्ट्रीय विद्यालय में प्रवेश लिया, जिसकी स्थापना बापूजी अणे और बाबासाहेब परांजपे ने की थी। दुर्भाग्यवश, ब्रिटिश सरकार ने शीघ्र ही उस विद्यालय को भी बंद करा दिया, जिससे केशव की शिक्षा की राह में और कठिनाइयाँ खड़ी हो गईं।
वे आगे की संभावनाएँ तलाशते हुए पुणे पहुँचे। उसी दौरान कलकत्ता (अब कोलकाता) के कुछ देशभक्तों ने एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। उस विश्वविद्यालय की परीक्षा जुलाई माह में अमरावती में आयोजित की जानी थी। केशव ने उस परीक्षा में भाग लिया और 1909 में मात्र 20 वर्ष की आयु में मैट्रिक उत्तीर्ण किया। उस समय कलकत्ता राजनीतिक गतिविधियों, विशेषकर क्रांतिकारी आंदोलनों का प्रमुख केंद्र था। वहीँ पर केशव अनुशीलन समिति के माध्यम से क्रांतिकारियों के निकट संपर्क में आए। उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने के एकमात्र उद्देश्य से कलकत्ता के नेशनल मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेने का निश्चय किया। यदि वे चाहते तो चिकित्सा की पढ़ाई करके सफल चिकित्सक बन सकते थे, किंतु उनका मन केवल राष्ट्रसेवा और स्वतंत्रता संग्राम में ही रमा रहा। डॉ. हेडगेवार 1916 में कलकत्ता से नागपुर लौटे। उन्होंने न तो विवाह किया और न ही पारिवारिक जीवन अपनाया। उनका संपूर्ण जीवन केवल राष्ट्र और उसकी स्वतंत्रता के लिए समर्पित रहा। इसी अवधि में प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हो चुका था और भारतीय क्रांतिकारी यूरोप की स्थिति का लाभ उठाकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ने की योजनाएँ बना रहे थे।
हालांकि, कुछ कारणों से यह योजना सफल नहीं हो सकी। वास्तव में प्रथम विश्व युद्ध के बाद इंग्लैंड एक मजबूत देश के रूप में उभरा। डॉ. हेडगेवार लोकमान्य तिलक से बहुत प्रभावित थे। हालांकि, लोकमान्य तिलक 1908 से 1914 तक जेल में थे। 1914 में रिहाई के बाद, लोकमान्य तिलक ने 'पुनश्च हरि ओम' की घोषणा करके स्वतंत्रता के लिए अपनी लड़ाई फिर से शुरू कर दी। डॉ. हेडगेवर कांग्रेस में फिर से सक्रिय हो गए, जो उस समय एकमात्र राजनीतिक मोर्चा था। डॉ. हेडगेवार टीम के प्रमुख थे, जिसे दिसंबर 1920 में नागपुर में आयोजित कांग्रेस सम्मेलन की व्यवस्थाओं को देखने के लिए कहा गया था। उसी अवधि (अगस्त 1,1920) में लोकमान्य तिलक की मृत्यु हो गई और महात्मा गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व किया। डॉ. हेडगेवार ने कांग्रेस के लिए काम करना जारी रखा, क्योंकि महात्मा गांधी स्वदेशी और ब्रिटिश शासन के साथ असहयोग पर जोर दे रहे थे। डॉ. हेगड़ेवार ने लोगों को स्वतंत्रता के बारे में जाग्रत करने के लिए गांवों और कस्बों का दौरा करना शुरू कर दिया, जिससे ब्रिटिश सरकार का क्रोध भड़क उठा। डॉ. हेडगेवार को राजद्रोह के आरोप में एक साल की जेल हुई थी। उन्हें जुलाई 1922 में जेल से रिहा किया गया।
हालांकि डॉ. हेडगेवार मुसलमानों के प्रति महात्मा गांधी के दृष्टिकोण से संतुष्ट नहीं थे। महात्मा गांधी राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दे रहे थे। डॉ. हेडगेवार ने गांधी जी से मुलाकात की और पूछा कि वह केवल हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर क्यों दे रहे हैं, जबकि अन्य धर्मों के लोग भी भारत में रहते हैं। महात्मा गांधी ने यह कहकर डॉ. हेडगेवार को संतुष्ट करने की कोशिश की कि वे हिंदू-मुसलमान एकता पर बल देकर मुसलमानों को देशभक्त बनाने का प्रयास कर रहे हैं। डॉ. हेडगेवार ने कांग्रेस के साथ काम करना जारी रखा। हालाँकि वे कुछ अन्य विचारों से भी परेशान थे। क्रांतिकारी कार्य की अपनी सीमाएँ हैं, लेकिन कांग्रेस पद्धति के साथ भी ऐसा ही था। डॉ. हेडगेवार ने गंभीरता से महसूस किया कि लोगों को जाग्रत और संगठित करना ही स्वतंत्रता प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है। वे एक और विचार से परेशान हो जाते थे। उन्होंने महसूस किया कि व्यापार के उद्देश्य से आए मुट्ठीभर ब्रिटिश लोग इस राष्ट्र पर शासन करने में कामयाब हो गए हैं।
उन्होंने महसूस किया कि यह कार्य केवल अपने ही लोगों के सहयोग से संभव हो सकता है। उन्होंने गहराई से अनुभव किया कि राष्ट्र को हर समय जाग्रत और सतर्क बनाए रखने के लिए अत्यंत प्रेरित कार्यकर्ताओं के एक सशक्त संगठन की आवश्यकता है। इसी विचार से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। उस समय डॉ. हेडगेवार मात्र 36 वर्ष के थे। आरंभ में उनके तरीकों का उपहास उड़ाया गया, किंतु वे अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुए। संघ का गठन मुख्यतः हिंदुओं को संगठित कर राष्ट्र को सशक्त बनाने के उद्देश्य से किया गया था। विभिन्न कारणों से हिंदू समाज विभाजित और निर्बल हो गया था, जिससे देश भी दुर्बल बना। डॉ. हेडगेवार के लिए हिंदुओं का संगठन केवल उनकी एकता तक सीमित नहीं था, बल्कि ऐसे स्वयंसेवकों का निर्माण करना था, जो राष्ट्रहित में किसी भी सीमा तक जाने और आवश्यकता पड़ने पर अपना जीवन बलिदान करने को भी तत्पर रहें। इसके लिए उन्होंने समानता और अनुशासन विकसित करने के अनेक अभिनव प्रयोग किए। उदाहरणस्वरूप, आदेश मिलते ही स्वयंसेवक तुरंत पंक्ति में खड़े हो जाते। इसे “एकश: संपत” कहा जाता था। जाति, भाषा या अन्य किसी भी विभाजनकारी तत्व को दरकिनार कर सभी स्वयंसेवक एक ही पंक्ति में खड़े हो जाते। इस प्रकार के प्रयोगों ने स्वयंसेवकों में आत्मविश्वास, दृढ़ता और भाईचारे की भावना उत्पन्न की। डॉ. हेडगेवार ने यह सुनिश्चित किया कि संघ में किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो। सभी कार्यक्रम सामूहिक रूप से आयोजित किए जाते थे। आरंभ में वे लोगों से प्रतिदिन केवल एक घंटा संघ के लिए देने का आग्रह करते थे, लेकिन समय बीतते-बीतते अनेक लोग अपने जीवन को पूर्णतः संघकार्य के लिए समर्पित कर समर्पित स्वयंसेवक बन गए। विशेष रूप से, उन्होंने संगठन के कार्यकर्ताओं के लिए 'स्वयंसेवक' शब्द ही चुना। यह एक ऐसा शब्द है, जो सेवा और राष्ट्रभक्ति की भावना को स्वतः अभिव्यक्त करता है।
डॉ. हेडगेवार ने कभी भी किसी को संघ में जबरन शामिल करने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने अपने आदर्शों और कार्यों के माध्यम से लोगों को प्रेरित करने पर जोर दिया। उनका दृढ़ विश्वास था कि हिंदू समाज को जाग्रत और शिक्षित करने का स्थायी मार्ग केवल आत्म-प्रेरणा है। उन्होंने 'स्वयंसेवक' शब्द को नए अर्थ और गरिमा प्रदान की। आरंभ में इसका उपहास उड़ाया जाता था, किंतु हेडगेवार के दृष्टिकोण में स्वयंसेवक केवल संगठन का सदस्य नहीं, बल्कि एक सच्चा देशभक्त नागरिक था। डॉ. हेडगेवार एक अद्वितीय दूरदर्शी थे। उन्होंने व्यक्ति से अधिक संगठन को महत्त्व दिया। अपने आदर्शों के प्रति उनकी निष्ठा इस बात से स्पष्ट होती है कि उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों से आग्रह किया कि वे भगवा ध्वज को ही अपना गुरु मानें। जब कुछ कार्यकर्ताओं ने गुरु पूर्णिमा पर उन्हें सम्मानित करना चाहा। तो उन्होंने व्यक्तिगत महिमामंडन को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया और कहा कि भगवा ध्वज शाश्वत हिंदुत्व का प्रतीक है। वे व्यक्तिगत महिमा और पूजनीयता के सख्त विरोधी थे और मानते थे कि व्यक्ति नहीं, बल्कि संगठन और उसके आदर्श ही सर्वोपरि होने चाहिए।
उनके नेतृत्व ने विनम्रता और सामूहिक उद्देश्य की संस्कृति को जन्म दिया, जहाँ संगठन को सदैव व्यक्तियों से ऊपर रखा गया। संघ में ‘गुरु’ के रूप में भगवा ध्वज की प्रतिष्ठा इसी दृष्टिकोण का परिणाम है। डॉ. हेडगेवार और अन्य समकालीन नेताओं या दार्शनिकों के बीच सबसे बड़ी विशिष्टता यह थी कि उन्होंने अपने गंतव्य और मार्ग दोनों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया था। उनका विश्वास था कि यह मार्ग न केवल राष्ट्र को उसके गंतव्य तक ले जाएगा, बल्कि ऐसे कार्यकर्ताओं का भी निर्माण करेगा जो स्वयं उस पथ पर चलकर राष्ट्र को आगे बढ़ाएँगे। डॉ. हेडगेवार का संगठनात्मक दर्शन व्यक्तिगत विकास के माध्यम से कार्यकर्ता निर्माण पर केंद्रित था। उनका मानना था कि जब एक व्यक्ति आदर्श, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण होगा, तभी उससे एक सशक्त कार्यकर्ता तथा कैडर का निर्माण संभव होगा। आज, संघ से प्रेरित कार्यकर्ता राष्ट्रीय जीवन के विविध क्षेत्रों में अपना योगदान दे रहे हैं। इसका श्रेय उन मूल्यों को जाता है, जिन्हें डॉ. हेडगेवार ने संगठन की नींव में स्थापित किया। संघ का दर्शन सतत और प्रगतिशील विकास पर आधारित है, जो इसकी लचीलापन, समयानुकूलता और जीवन्तता का प्रतीक है।
संघ ने गतिशील और प्रगतिशील हिंदुत्व को अपनाते हुए समय और परिस्थितियों के साथ स्वयं को ढाल लिया है। अपने मूल सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा रखते हुए निरंतर विकसित होने की इसकी क्षमता डॉ. हेडगेवार द्वारा रखी गई सुदृढ़ नींव का प्रत्यक्ष परिणाम है। उनकी दूरदर्शी सोच और कार्यपद्धति आज भी संघ को दिशा देती है। यही कारण है कि संघ केवल एक संगठन न रहकर एक सशक्त आंदोलन बन चुका है, जो हर पीढ़ी के साथ और अधिक सुदृढ़ होता जा रहा है। डॉ. हेडगेवार की समाधि नागपुर के रेशमबाग परिसर में स्थित है। यह स्थान हिंदू संगठन और राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा का जीवंत प्रतीक बनकर प्रत्येक आगंतुक को राष्ट्रसेवा की ओर प्रेरित करता है।